चातुर्मास्य का का चमत्कारी समय के उपयोग हो जाओगे सर्वगुणसंम्प्पन ?

वर्षाकाल के चार महीनों को चातुर्मास्य के नाम से जाना जाता है। इन चार महीनों में भगवान् विष्णु योगनिद्रा में शेषशय्या पर शयन करते हैं, इसलिए यह समय जलतत्व के विज्ञान से जुड़ा है। ज्योतिष के अनुसार इन दिनों सुर्य कर्क राशि पर स्थित रहता है। चातुर्मास्य का समय आषाढ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक होता है। श्री हरि की आराधना के लिए यह समय उत्तम है। सब तीर्थ, देवस्थान, दान और पुण्य चातुर्मास्यि आने पर भगवान् विष्णु की शरण लेकर स्थित होते हैं। जो मनुष्य चातुर्मास्य में नदी में स्नान करता है, विशेष सरूप से तीर्थ नदियों में, उस व्यक्ति के अनेक पापों का नाश हो जाता है, क्योंकि वर्षा का जल स्थान-स्थान से धरती की मिट्टी से प्राकृतिक शक्ति को सँजोकर नदी के बहाव के साथ समुद्र की ओर ले जाता है। वर्षाकाल में नदियों का जल कई रोगों का नाश करता है। चातुर्मास्य में भगवान् नारायण जल पर शयन करते हैं। अतः जल में भगवान् विष्णु के तेज, तत्त्व व ओज तीनों का अंश भी व्याप्त रहता है। इसलिए उस तेज से युक्त जल का स्नान समस्त तीर्थों के पुण्यों से भी अधिक फलदायी है। चातुर्मास्य में बालटी में एक-दो बिल्वपत्र डालकर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का ४-५ बार जप करके स्नान करें तो विशेष लाभ होता है। इससे शरीर का वायु दोष दूर होता है और स्वास्थ्य की रक्षा होती है। चातुर्मास्य में काला और नीला वस्त्र पहनना हानिकारक है, क्योंकि वातावरण इन दिनों निर्मल होता हैं, अतः सूर्य की किरणें तीव्र होती हैं। ये दोनों रंग सूर्य की किरणों से अन्य सभी रंगों को समाविष्ट कर लेते हैं। वर्षा ऋतु में सूर्य किरणों की तीव्रता अधिक मात्रा में होती है, जो शरीर के लिए हानिकारक है, इसीलिए इन दोनों रंगों के वस्त्र वर्जित हैं। इन चार महीनों में भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य- पालन, पत्तल में भोजन, मौन, ध्यान, दान-पुण्य और उपवास आदि विशेष लाभप्रद हैं। चातुर्मास्य में परनिंदा का विशेष रूप से त्याग करना चाहिए। परनिंदा को सुननेवाला भी पाप का भागी होता है। परनिंदा एक महान् पाप है। इस दोष का फल अगले जन्मों में मनुष्य को यश से वंचित रखता है। जो व्यक्ति पंद्रह दिन में एक दिन संपूर्ण उपवास करे, उसके शरीर के अनेक दोष नष्ट हो जाते हैं और चौदह दिनों में उसके शरीर में भोजन से जो रस बनता है, वह ओज में बदल जाता है। इसलिए एकादशी के उपवास का महत्त्व है।बचातुर्मास्य में चूँकि भगवान् नारायण योगनिद्रा में होते हैं, इसलिए इन महीनों के दौरान हिंदू शादी-विवाह और दूसरे सकाम यज्ञ आदि नहीं करते। ये चार मास नाम-जप व तपस्या के लिए उपयुक्त हैं।
इसलाम धर्म में भी रमजान के महीने में एक माह रोजा रखने का प्रावधान है। व्रत के अतिरिक्त 'करान' के अनुसार, इस पवित्र मास में एक सच्चा मुसलमान अपने द्वारा वर्ष भर में किए पापों का प्रायश्चित्त करता है, परनिंदा से दूर रहता है, दान करता है और पाँचों वक्त की नमाज पढ़ता है। इन सब बातों का अर्थ यह हुआ कि दोनों धर्मों में शारीरिक व्रत के साथ-साथ मानसिक व्रत भी करना जरूरी है। मानसिक व्रत के बिना आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती।



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