जपमाला के संख्या 108 ही क्यों होती है ?

मंत्रसाधना के लिए या नाम जप के लिए माला का प्रयोग लगभग सभी धर्मों में है। अंतर केवल इतना है कि माला के दाने अलग-अलग गणित से पिरोए जाते हैं । हिंदू धर्म में १०८ दानेवाली माला का प्रयोग प्रायः होता है। मुसलमान माला को 'तस्वी' कहते हैं और उसमें १०० दाने होते हैं, हर ३३ दानों के बाद एक 'जामीन' नामक दाना होता है। तस्वी में सबसे ऊपर के दाने को 'ईमाम' कहते हैं। ईसाई धर्म में माला 'रोज़री' कहलाती है और इसमें ६० दाने होते हैं। रोज़री में सबसे ऊपर 'क्रसीफिस्स' होता है। सिखों की माला में २७ दाने होते हैं। सिख १०८ दानों की माला का भी प्रयोग करते हैं । वैसे मालाएँ दो प्रकार की होती हैं- एक जपमाला और दूसरी धारण करने की माला । जपमाला १०८ दानों की होती है, जबकि धारण करनेवाली माला ३२, २७, ५ या ३ दानों की होती हैं। जिस माला से जप करते हैं, उसे धारण या पहनना नहीं चाहिए 
हिंदुओं में १०८ दानों के पीछे अंक विज्ञान है। सबसे ऊपर के दाने को 'सुमेरु' कहते हैं। सनातन ऋषि-मुनियों ने १०८ दानों का गणित प्रकृति के कई सिद्धांतों को ध्यान में रखकर निश्चित किया था। इस अंक का विज्ञान पूरे बम्हाण्ड को अपने में समाए हुए है। यह अंक संख्या नौ ग्रहों और बारह राशियों का गुणनफल है (९ x १२१०८), जो पूरे ब्रहमांड को अपने में समाहित किए हुए है। नक्षत्र संख्या में सत्ताईस हैं और हर नक्षत्र के चार-चार चरण हैं, जिनका गुणनफल भी १०८ है ( २७ x ४=१०८) वैज्ञानिक दृष्टि से तीन आयामों की इस दुनिया से परे जो चौथा आयाम है, उसी को अपने में समाए जो अंक
बनता है, उसी से सत्ताईस नक्षत्रों की गणना को गुणा करने से भी १०८ का अंक बनता है। इस प्रकार मंत्र ध्वनि उस चौंथे आयाम तक पहुँचती है, जो इन आयामों की दुनिया से परे है। एक और कारण से भी १०८ का अंक महत्त्वपूर्ण है। एक दिवस में चौबीस घंटे होते हैं, पल, घड़ी और हर घड़ी में साठ पल व हर घंटे में साठ, हर पल में साठ प्रतिपल, इस प्रकार एक दिन में (६० x ६० x ६०=२१६०००) विपल होते हैं, जब हम इसे दो से भाग देते हैं तो १०८००० संख्या आती है, जिसके मूल में १०८ की संख्या है। हिंदू धर्म में मालाएँ भी कई प्रकार की हैं, जिनका उपयोग अलग-अलग कार्यसिद्धि और देवताओं के लिए होता है। आमतौर पर तुलसी, चंदन व रुद्राक्ष की माल होती है। पर विशेष मंत्र साधना के लिए मुक्ता माला (मोती), प्रवाल माला (मूँगे), हलदी की माला, कमलगट्टे की मालाएँ भी होती हैं। इन सबके पीछे जो विज्ञान है, वह मंत्र
विशेष या देवी- देवता की 'तंरगों' को ध्यान में रखकर किया गया है। उदाहरण के लिए, मोती की माला का प्रयोग
चंद्रमा ग्रह और लक्ष्मी देवी से संबंधित है। इसी प्रकार हलदी की माला माँ दुर्गा से संबंध रखती है। परंतु रुद्राक्ष की माला सर्वश्रप्ठ है और किसी मंत्र या देवता की पूजा-आराधना में प्रयोग की जा सकती है। अभिप्राय यह है कि माला का चयन वैज्ञानिक कारण से है, किसी काल्पनिक या अंधविश्वास के कारण नहीं जपमाला के विषय में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जपमाला हर व्यक्ति की अपनी अलग होनी चाहिए। किसी
दूसरे व्यक्ति की जपमाला का प्रयोग नहीं करना चाहिए और न ही अपनी माला जपने के लिए किसी को देनी चाहिए। आपकी माला आपके आध्यात्मिक ' लॉकर' की तरह होती है, जिस पर आपने मंत्रों की जमापँजी सुक्ष्म रूप से सँजोई होती है। इसलिए जप करते समय आप को अपनी माला गोमुखी में रखकर जाप करना चाहिए, ताकि कोई आप को जप करते समय देखे नहीं। माला द्वारा मंत्र जाप किए जाने के पीछे वैज्ञानिक पक्ष यह है कि अंगुष्ठ (अंगुठा) और मध्यमा अंगुली द्वारा जब माला का दाना फेरा जाता है तब इन तीनों के संघर्ष से एक विलक्षण मानव-विद्युत् उत्पन्न होती है, जो सीधी हमारे हृदय-चक्र को प्रभावित करती है। इससे मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है।बसनातन चिंतन के अनुसार हमारे शरीर में अंगुष्ठ का संबंध आत्मा से और मध्यमा अंगुली का हदय प्रदेश से सीधा संबंध है, इसीलिए मंत्रजाप माला द्वारा ही करना चाहिए। 


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