नही करनी चाहिए श्रीगणेश से पहले पूजा होगा बुरा ?

सबसे पहले गणेश की ही पूजा क्यों
जिस प्रकार विष्णु विष्णुलोक और शिव शिवलोक के स्वामी हैं, उसी प्रकार ' गणेश' पृथ्वीलोक के स्वामी हैं ।
गणेश में पृथ्वीत्त्व की प्रधानता है। इसीलिए आपने प्रायः देखा होगा कि किसी भी पूजा-पाठ, जिसमें गणेशजी की कोई प्रतिमा नहीं रखी होती, वहाँ पंडितजी मिट्टी का एक ढेला लेकर उस पर ही मौली बाँधकर ' गणेशजी' की स्थापना कर लेते हैं। पृथ्वीलोक पर होनेवाले सभी शुभ कार्य बिना किसी बाधा के संम्प्पन हों, इसलिए हम गणेशजी का ध्यान कर प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी अनुकंपा करें। गणेश सभी कठिनाइयों व अमंगल को दूर करते हैं, इसलिए उन्हें विघ्नेश्वर भी कहते हैं। पृथ्वीलोक के स्वामी होने के नाते वे दसों दिशाओं के अधिपति भी हैं । पृथ्वी पर किसी अन्य लोक से आनेवाली कोई शक्ति इन्हीं दिशाओं से आती है। इस कारण, दूसरे देवलोकों से पृथ्वीलोक पर पहुँचने के लिए अन्य दैविक शक्तियों को गणेश-शक्ति की सहायता की आवश्यकता होती है। दूसरे देवताओं की कृपा व आशीर्वाद यहाँ पृथ्वीलोक पर हम तक ठीक-ठाक पहुँचे, इसलिए हम गणेशजी से प्रार्थना करते हैं कि वे अन्य देवताओं की कृपा व आशीर्वाद हम तक पहुँचने दें। गणेश-पूजन सरवप्रथम करने का एक और कारण यह है कि हम जो प्रार्थना करते हैं, वह शब्दों में होती है, जिसे वेद-पुराणों में नाद-भाषा कहते हैं, जबकि देवताओं की भाषा 'प्रकाश-भाषा' होती है। गणेशजी हमारी नाद-भाषा को देवताओं की प्रकाश-भाषा में रूपांतरित कर देते हैं और इस प्रकार से हमारी प्रार्थना गणेशजी की कृपा से दूसरे देवताओं तक पहुँच जाती है। इन्हं कारणों से गणेश-पूज़न सर्वप्रथम किया जाता है।गणेश पर लाल फूल व दूब ही क्यों चढ़ाते हैं मुर्ति-शास्त्र के अनुसार, भगवान् गणेश का रंग लाल है। हमारे शरीर में जो पहला चक्र मूलाधार है, गणपति उस चक्र के स्वामी हैं। मूलाधार चक्र का जो कमल है, उसका रंग लाल हैं। लाल रंग के पुष्पों का सपंदन गणेश तत्त्व से मेल खाता है, इस कारण गणेश पवित्रता व स्पंदन की ओर शीप्रता से आकर्षित होते हैं और जल्दी ही प्रसन्न हो जाते हैं। गणेश-पूजन में लाल फूलों के साथ लाल वस्त्र व रक्त चंदन (लाल) का भी प्रयोग किया जाता है। इन सबके पीछे भी यही विज्ञान है। लाल रंग के पुष्पों के अतिरिक्त गणपति पर दूर्वा (कोमल घास) भी चढ़ाई जाती है। दूर्वा में भी गणेश तत्त्व को आकर्षित करने की शक्ति है, इसलिए गणेशजी पर १, ३, ५, ७ की संख्या में दुब चढ़ाने का विधान है। जिन मूर्ति या चित्रों पर लाल रंग के फूल व दूर्वा चढ़ाई जाती हैं, वे मूर्ति व चित्र गणेश तत्त्व से शीघ्र ही जाग्रत् हो जाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं। इन्हीं कारणों से गणेशजी की प्रतिमा व चित्रों पर लाल रंग के फूल, लाल चंदन, लाल वस्त्र व दूर्वा ही चढ़ानी चाहिए, ताकि गणपति ऋद्धि-सिद्धि तथा 'श्री' प्रदान करें। कौन से गणेश की मर्ति घर के पूजागृह में रखनी चाहिए गणेशु की मुर्ति या चित्र की ओर सामने से देखते समय जिस मूर्ति में उनका अग्रभाग हमारी दाई ओर मुड़ा हुआ हो, ऐसी मू्ति या चित्र को ही घर के पूजागृह में रखना चाहिए। इस प्रकार की मूर्ति को वाममुखी मूर्ति या चित्र कहते हैं। ऐसी मूर्ति घर में सुख-शांति लाती है। इसका कारण यह है कि गणेश की चंद्र-शक्ति इन मूर्तियों या चित्रों में अधिक सब्रिय-प्रवाहित होती है। वाममुखी उत्तर दिशा को दरशाती है, ऐसी प्रतिमाएँ अध्यात्म की दृष्टि से भी अपेक्षित हैं। यही कारण है कि घरों के पूजागृहों में वाममुखी गणपति प्रतिमा ही स्थापित की जाती है। गणपति की जिन मूर्तियों व चित्रों में उनकी सूँड का अगला भाग सामने से हमारी बाई ओर मुड़ा दिखे, उन्हें दक्षिणमूर्ति कहते हैं।
ऐसी मूर्तियों में गणेशजी की सूर्य नाड़ी सक्रिय व प्रवाहित होती है। सूर्य नाड़ी के कारण वातावरण उत्तेजित रहता है, जो घर की शांति के लिए हितकर व अपेक्षित नहीं होता। दक्षिणामूर्ति गणपति, दक्षिण दिशा, जो यमलोक को दरशाती हैं, के द्योताक हैं। दक्षिणामुखी मूर्ति की पूजा सामान्य विधि से नहीं की जाती, क्योंकि गृहस्थ लोग इस प्रकार की मूर्तियों की पूजा का विधि-विधान नहीं जानते। अत: घरों में दक्षिणामुखी गणपति नहीं रखने चाहिए। दक्षिण दिशा यमलोक की दिशा है, जहाँ मनुष्य के पाप-पुण्य का हिसाब रखा जाता है। इसलिए यह दिशा अप्रिय है। इस कारण ऐसी मूर्ति बिना कर्मकांड के पूजनी नहीं चाहिए। परंतु मंदिरों के लिए ऐसी मूर्तियाँ उपयुक्त हैं, क्योंकि वहाँ पूजा-पाठ विधि-विधान व समयानुसार होता है। मूर्ति के खंडित या भंग होने पर उस पर अक्षत (साबुत चावल) डालकर जल में विसर्जित कर देना चाहिए या फिर आदर से पीपल के वृक्ष के नीचे रख देना चाहिए।

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