घोड़े की नाल की अँगूठी और शनि ग्रह का रह्स्य ?

शनि नवग्रहों में अपना अलग ही स्थान रखते हैं। पुराणों में इन्हें प्रकृति का न्यायाधीश कहा गया है। चित्रगुप्त मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा जो रखते हैं, शनिदेव उन पर एक निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह निर्णय लेते हैं और कर्ानसार दंड देते हैं। शनि सूर्य व उनकी दूसरी पत्नी छाया के पुत्र हैं। ये नील वर्ण हैं, कुछ के अनुसार ये श्याम वर्ण हैं। शनि का रत्न "इंद्रनील' (नीलम) है। इनका अनाज काले उड़द, वस्त्रों का रंग काला, वाहन गिद्ध और धातु लोहा है। सौरमंडल का यह अद्वितीय और अनूठा ग्रह किसी भी व्यक्ति को राजा से रंक और रंक से राजा बनाने की क्षमता रखता है। हमारे प्राचीन तत्त्व-विज्ञान के अनुसार शनि ग्रह में वायु तत्तव प्रधान होता है। जिस व्यक्ति के शरीर में वायुदोष होगा, उस व्यक्ति को वायु विकार के रोग होंगे, जैसे जोड़ों मे दर्द, पेट में गैस बनना, घुटनों और कुहनियों में पीड़ा आदि। तत्त्व-विज्ञान के अनुसार जिस तत्त्व के कारण जब कोई विकार पैदा हो, तब उसी के विरोधी तत्त्व को लेने या धारण करने से पीड़ा व विकार का निदान होता है। वायु-विकार दूर करने के लिए और शनि ग्रह के कुप्रभावा को शांत करने के लिए ऋषि-मुनियों ने घोड़े की नाल की अँगूठी या छल्ला धारण करना हितकर माना है। प्राचीन विज्ञान इस विषय में बहुत गहरे में उतरता है। जिस घोड़े की नाल से छल्ला बनाना होता है, वह शहरों में ताँगे या टमटम के आगे जुतनेवाले घोड़े की नाल से बना नहीं होना चाहिए । शहरों की पक्की सड़कों पर चलनेवाले घोड़े की नाल में वह असर नहीं पाया जाता जो शनिदोष व वायु विकार को दूर कर सके। इसके लिए ऐसा घोड़ा ढँढ़ा जाता है, जो कई बरसों से घने जंगलों में दौड़ता रहा हो। जंगल की मिट्टी से और वहाँ की जंगली घास, जड़ी-बूटियों से उसकी नाल में वे सब तत्तव समा जाते हैं, जो शनिदोष को दूर करने में सक्षम होते हैं । जंगल और घास पर दौड़नेवाले घोड़े में एक और विशेषता यह भी होनी चाहिए कि वह रंग में काला हो, क्योंकि काला रंग शनि का अपना रंग है। रंग-विज्ञान के अनुसार काला रंग सूर्य के सातों रंगों को अपने में समा लेता है। इसका अर्थ यह हुआ कि काले घोड़े में सूर्यशक्ति को समाविष्ट करने की क्षमता दूसरे रंग के घोड़ों से अधिक होती है। सूर्य की सौर शक्ति के कारण काले घोड़े के पैरों में लगी नाल लगातार सूर्य की गरमी ग्रहण करती रहती है। सूर्य की गरम के साथ एक और विज्ञान इस घोड़े की नाल में कार्यरत रहता है, वह है उसका सतत जमीन पर टप-टप चलना, जिससे उसका लोहा विशिष्ट बन जाता है। उस लोहे पर लगातार टप-टप चोट से उसकी आंतरिक अणु
रचना बदल जाती है। यानी नाल के लोहे का आंतरिक एटॉमिक स्ट्रेक्वर (Atomic structure) सतत टप-टप चाल
से बदल जाता है। ऐसे विशिष्ट नाल के लोहे से बना छल्ला या अगृूठी अवश्य ही शनिदोष निवारण का अचूक उपाय है। पर क्या ऐसा घोड़ा मिलना आसान है? ऐसे घोड़े के अगले दाहिने पॉव की नाल से बना छल्ला धारण करें तो यह आपको मनोवांछित फल देगा । परंतु आजकल हर जगह काले घोड़े की नाल आराम से मिल जाती है; पर यह हमारे किसी काम की नहीं होती, क्योंकि इसमें वह विशिष्टता नहीं होती जो होनी चाहिए । अब अगर लोहे का छल्ला शनिदोष निवारण नहीं कर पा रहा है, तो इसके पीछे जो विज्ञान है उसका दोष क्या?


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