औ३म् यदि सनातन धर्म की अत्मा है तो गौ उसके प्राण। भारत में गौमाता की पूजा सदा से होती आई है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार गौ भारत की ही नहीं अपित् विश्वमाता है। इसका उल्लेख हमारे वेद-पुराणों, गीता-रामायण आदि सभी धर्मंग्रथों में मिलता है। वेदों का मानना है कि विश्व के जड़ -चेतन सभी प्राणियों में कोई-न-कोई देवता वास करते हैं। परंतु गौमाता के शरीर में तो सभी देव-तत्त्व विद्यमान हैं। इसी कारण गाय को सर्वदेवमरयी एवं विश्वरूपा कहा गया है। हिंदू धर्म शास्त्रों के शायद ही कोई ऐसा ग्रंथ होगा, जिसमें गौमाता की महिमा का वर्णन न किया गया हो। पुराणों में कामधेनु, नंदिनी, सुरभि, सुभद्रा, सुशीला, बहुला आदि दैविक गायों का उल्लेख मिलता हैं। गाय का दूध सात्त्विक गुणों को जाग्रत् करता है। देवताओं को इसके दूध का अभिषेक व इससे बने पदार्थ अत्यंत प्रिय हैं। गाय आर्यों की परम प्रिय थी, जिसका दूध वे प्रतिदिन सेवन करते थे और आपस में एकता व प्रेम से रहते थे। इसके विपरीत राक्षसों की संस्कृति में भैंस को प्रधानता दी जाती थी।
गाय से प्राप्त दुध, दही, घी, गोबर और गौमूत्र- ये सभी पदार्थ पवित्र हैं। इन पाँचों पदार्थों को मिलाकर पंचगव्य' बनाते हैं। पंचगव्य पापों का नाश करनेवाला व शुद्ध करनेवाला माना जाता है। शिव प्रिय बिल्व वृक्ष गऊमाता के गोबर से उपजा है। इस वृक्ष में माँ भगवती लक्ष्मी का निवास है। इसलिए इसे 'श्रीवृक्ष' भी कहते हैं। नीलकमल तथा रक्तकमल फूलों के बीज भी गौ के गोबर से ही उत्पन्न हुए हैं । गौमाता के मस्तक से उत्पन्न पवित्र गोरोचन सिद्धिदायक है। गुग्गल नाम का सुगंधित पदार्थ गोमूत्र से पैदा होता है। गुग्गल देवप्रिय आहार है, इसलिए हवन करते समय इसकी आहुति दी जाती है। यह आहुति देवताओं को प्रसन्न करती है और मनुष्य का कल्याण भी करती है। गाय से संबंधित ये सभी मान्यताएँ कोई ढकोसला नहीं हैं बल्कि इनके पीछे गृढ़ वैज्ञानिक आधार है। प्रकृति ने गाय के शरीर को ऐसा बनाया है कि उसके शरीर से उत्पन्न हर पदार्थ अपने में विशिष्ट गुण रखता है, जो मनुष्य के लिए हितकर है। प्रकृति गाय के शरीर में ये विशिष्टताएँ दो कारणों से पैदा करती है। एक तो यह कि गाय के शरीर की जो चर्म है, वह सूर्यकिरणों से विशेष शक्ति और ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता रखती है, जिसके कारण गाय से पैदा होनेवाले सभी पदार्थ विशेष गुणकारी होते हैं। दूसरी विशिष्टता यह है कि गाय की शारीरिक आंतरिक बनावट इस प्रकार है कि उसके शरीर से पैदा हुए पदार्थ विशेष होते हैं। प्राचीन काल में जब हमारे देश के गाँवों में किसी कारण महामारी, प्लेग आदि फैलता था, तब हमारे पूर्वज गाय के गोबर से घरों की दीवारों पर चार अंगुल चौड़ी रेखा घर के चारों तरफ लिपवा देते थे, जिससे रोग के कीटाणु घर में प्रवेश नहीं कर पाते थे। गोमूत्र अनेक रोगों का नाश करता है। इसमें कैंसर जैसे रोगों को भी नियंत्रित करने की क्षमता है। ऐसा इसलिए संभव है, क्योंकि गोमूत्र में 'गंगा' निवास करती है। इस मान्यता का अर्थ है कि गंगाजल की तरह गोमूत्र भी पवित्र और कीटाणुनाशक है। गाय के दूध को आयुर्वेद में अमृत कहा गया है। आज वैज्ञानिकों ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि गौमाता के चर्म में वह आकर्षण शक्ति है, जो सूर्य की किरणों से एक प्रकार का स्वर्णिमत्त्व आकृष्ट करके अपने दूध में समाविष्ट कर लेती है। इसी कारण गाय के दूध और घी में कुछ पीलापान झलकता है। सूर्य से प्राप्त यही पीलापन मनुष्य के लिए बहत लाभदायक है, जो हमारी आंतरिक शक्ति को बढ़ाता है। वैज्ञानिक भाषा में गाय के घी-दूध का यह पीलापन लैक्टोज (Lactose) कहलाता है। इस कारण गाय का दूध माँ के दूध से मिलता-जुलता है, क्योंकि माँ के दूध में सबसे अधिक लैक्टोज होता है। इसके बाद लैक्टोज गाय के दूध में पाया जाता है। गाय के दृध का यह गुण बच्चों का लगभग माँ के दूध जैसा ही पोषण करता है। यदि हम अन्य दुधारू पशुओं, जैसे भैंस, बकरी, ऊँट, याक आदि को जंगल में बेरोक-टोक चरने के लिए गाय के साथ छोड़ दें तो देखेंगे कि गाय जो वनसपति खाती है, वह दूसरे पशुओं की अपेक्षा अलग होती है, जो उसके दृध को मनुष्य के लिए अधिक गुणकारी व पौष्टिक बना देती है। भैंसें घास तथा बकरी व ऊँट काटेदार वनस्पति अधिक पसंद करते हैं जबकि गाय घास के साथ कुछ विशेष पौधे भी चरती है, जो उसके दुध को विशिष्ट बनाते हैं। एक और तथ्य ध्यान देने योग्य यह है कि गाय के दृध में गाय के अपने चर्म का रंग भी महत्त्वपूर्ण है। वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा अब यह प्रमाणित हो चुका है कि लाल रंग और काले रंग की गायों का दूध सफेद रंग की गाय से गुणधर्म में अलग है। इस कारण उनके दूध की प्रभाव शक्ति भी भिन्न होती है। इस गुण-धर्म की भिन्नता का
वैज्ञानिक कारण यह है कि लाल और काली गायें अपने चर्म के रंगों के कारण सूर्य की शक्ति को भिन्न-भिन्न मात्रा व ढंग से अपने शरीर में ग्रहण करती हैं, जिसके कारण उनका दृध गुणवत्ता में अलग होता है। कर्मकांड में अलग-अलग प्रकार के गुणधर्मवाले दूध की आवश्यकता होती है। इसीलिए ब्राहमण पूजा में आपसे काली या लाल गाय का दूध लाने को कहते हैं।
आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि गाय के विषय में जो तथ्य बताए गए हैं, वे सब भारत की देशी गाय के विषय में हैं। विदेशी 'जसी' गाय के दूध में ये सब गुण पूर्णरूप से विद्यमान नहीं होते। इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि 'जर्सी' गाय की ' जेनेटिक म्यूटेशन' (Genetic mutation) देशी गाय से भिन्न होती है। प्राचीन काल में देशी गाय की भी कई प्रजातियाँ थीं, पर उन सबका दूध-दही गुण-धर्म में एक समान था। अमेरिका ने कानपुर की एक फर्म को 'गौमूत्र ' का पेटेंट दिया है और यह स्वीकार किया गया है कि गौमूत्र में कई बीमारियों की रोकथाम और ठीक करने की क्षमता है। रूस के वैज्ञानिकों, विशेषकर डॉ. शीरोविक के अनुसार गाय के गोबर से लीपे गए घरों पर परमाणु रेडिएशन का प्रभाव नहीं पड़ता। यही नहीं, गाय के घी की अगनि में आहुति देने से जो धुआँ उठता है, वह परमाणु रेडिएशन को काफी हद तक कम करता है। खेद है, आज भारत में उसी पूजनीय गाय की दुर्दशा है, वह सड़क पर गंदी चीजें व प्लास्टिक की थैलियाँ खाती है। ऐसी स्थिति में गाय के द्वारा दिया दूध-दही हमें पहले जैसा पौष्टिक व नीरोग कैसे बना सकता है? यदि ऐसे दूध के कारण आज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाला आधुनिक मानव गाय के विषय में किए गए गुणगान को ढकोसला या अंधविश्वास कहे तो आश्चर्य किस बात का ?
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