यज्ञ करने के पीछे क्या है विज्ञान ?

नमस्कार दोस्तों में आपका स्वागत करता हु हमारे ब्लॉग में तो जैसा की हम जानते है कि हिन्दू घर्म में बहुत से ऐसे संस्कार है जिनको इंसान अपने जीवन मे मृत्यु तक दोहराता रहता है लेकिन आज हम आपको बताने वाले है यज्ञ पूजा के बारे जैसे यज्ञ भी दो प्रकार के होते है एक सात्विक होता है और दूसरा तामसिक सात्विक में जहाँ पवित्र चीजो को दहन किया जाता दूसरी ओर तामसिक यज्ञ में पवित्र और अपवित्र दोनो चीजो को दहन किया जाता है 
यज्ञ (हवन) वैदिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। आर्य मूल रूप से अग्नि पूजक थे। ऋग्वेद का प्रथम शब्द अनि है और यज्ञ अनि-विज्ञान से जुड़ा है, जिसके अनुसार अगनि में जो भी वस्तु डाली जाती है, वह उसे भस्म करके उसका विस्तार कर देती है और सूक्ष्म रूप से उसे ऊपरी लोकों में भेज देती है। अमेरिका के 'नासा' वैज्ञानिकों ने भी यह स्वीकारा है कि उनके द्वारा प्रक्षेपित 'रॉकेट्रस ' से निकलनेवाली लपटों के कारण रॉकेट्रस में डाली ध्वनियों की मात्रा स्वत: बढ़ जाती है, जो इस प्राचीन सत्य को प्रतिपादित करती है कि अगनि उसमें डाली वस्तुओं का विस्तार करती है। अग्नि-पूजा का दर्शन है-प्रकृति के प्रति और अन्य देवों के प्रति जो हमारा ऋण है, उसे उतारना और वातावरण को शुद्ध करना। यज्ञ की सारी प्रक्रिया के पीछे अगनि व मंत्र दो शास्त्र निहित हैं। यज्ञ के लिए जो अग्निकुंड तैयार किए जाते हैं, वे शुद्ध गणित के आधार पर होते हैं। वैदिक गणित और सुलभ सूत्रों के अनुसार प्राचीन काल में रेखागणित की भिन्न-भिन्न दस आकृतियोंवाली ईटों का प्रयोग अग्निकुंड को बनाने में किया जाता था। ईटों का माप यज्ञ करानेवाले व्यक्ति के शारीरिक डीलडौल पर निर्भर करता था। रेखागणित के सुलभ सुत्र ईसा से आठ शताब्दी पूर्व के हैं । सन् १९७५ में, केरल में एक वैदिक यज्ञ का आयोजन किया गया था, जिसमें प्राचीन मूल पद्धति का अनुसरण किया गया और पाँच भिन्न-भिन्न आकार की एक हजार ईटों का प्रयोग किया गया था। इसके अतिरिक्त यज्ञ में डाली जानेवाली सामग्री, जैसे तरह-तरह की जड़ी-बृटियाँ, काले तिल, जौ, चावल, गुग्गल और गाय का शुद्ध घी-सभी का कैज्ञानिक ढंग से चयन होता था। ये सभी पदार्थ जब अग्नि में स्वाहा होते हैं तो सुक्ष्म और विस्तारित होकर वायुमंडल में विलीन हो जाते हैं। अग्नि में डालने से पूर्व मंत्रोच्चारण होता है जो उन पदार्थों को परिलक्षित कर देता है अथात् अग्नि में डाले जानेवाले पदार्थ को सूक्ष्म रूप से किस दैविक शक्ति को भेजा जा रहा है, वह बोले जानेवाले मंत्र से जाना जाता है। मंत्र के अनुसार अग्नि उस पदार्थ के सूक्ष्म रूप को निहित देव या देवी के पास पहुँचा देती है। बस यही यज्ञ का विज्ञान है। विशेष यज्ञों में हम देवताओं के मंत्रों के साथ आहुति में देवताओं की पसंद के पदार्थ भी अग्निकेकुंड में डालते हैं; जैसे गणेश हवन में गन्ने के द्कड़े, विष्णु हवन में चारु (दूध की खीर) और पितृ-हवन में काले तिल। अग्नि इन्हें जलाकर भस्म करके परिवर्तित रूप में देवताओं को पहुँचा देती है और वे प्रसन्न होकर हमें मन-वांछित फल प्रदान करते हैं। हवन की अग्नि जड़ी-बूटियों, मेवा व अन्य पदार्थों की भस्म बना देती है, जो एक सशक्त औषधि बन जाती है, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बाँट दिया जाता है। यज्ञ करनेवाले और करानेवाले दोनों के लिए कुछ नियम होते थे, जिनका उन्हें पूर्णरूप से पालन करना पड़ता था। इन नियमों में मन-शुद्धि और शरीर-शुद्धि दोनों अनिवार्य थीं, अन्यथा फल -प्राप्ति में बाधा आती थी। आजकल हम हवन तो करते हैं पर उन सब नियमों का पालन नहीं। हमें भोजन तो चाहिए, पर धीरे-धीरे चूल्हे की आग पर बना नहीं, बल्कि ओवन पर पका 'फास्टफूड' । इसी प्रकार हमें यज्ञ से भी तुरंत फल चाहिए, पर यज्ञ के नियमों का पालन नहीं। ऐसे में यज्ञ कैसे फलीभूत होगा? फाल्गुनी पूर्णिमा के दिन मनाए जानेवाला होली का पर्व एक सामूहिक यज्ञ ही था। कुछ विद्वानों के अनुसार यह प्राचीन अग्नि-पूजकों की एक अतिविशिष्ट परंपरा है, जिसका खूप आज बिलकुल बदल गया है। इस पर्व को मनाने के लिए मूल रूप से केवल गाय के गोबर से बने उपले, मेवा व नवधान्य ही अगनि में डाला जाता था। इस यज्ञ के लिए होलिका-दहन की अग्नि आज की तरह माचिस से नहीं अपित् मंत्रों द्वारा या फिर अगर की लकड़ी को रगड़कर प्रज्वलित की जाती थी। इस सामूहिक यज्ञ में प्राचीन समस्त समाज भाग लेता था। होली दहन ठीक उस समय पर किया जाता था जब चंद्रमा की कला पूर्ण होती थी, जिसका निश्चय गणितज्ञ द्वारा किया जाता था। इस यज्ञ की एक विशेषता यह भी थी कि इसे किसी आश्रम में नहीं बल्कि ग्राम क्षेत्र में आयोजित करते थे। इसका एक बड़ा लाभ यह होता था कि शीत के कारण जो वायुकण ऊपर वायुमंडल में न जाकर भूमि-स्तर पर ही रहते थे और ग्रामवासियों के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकते थे, इस यज्ञ की अग्नि की गरमी से हलके होकर ऊपर चले जाते थे और ग्राम के वातावरण को शुद्ध कर देते थे। होली का जो रूप हमें आज देखने को मिलता है, यह मूल रूप में वैसा नहीं था। आजकल होली के लिए कोई भी लकडी, गंदे साज-सामान और न जाने क्या-क्या इसमें जलाते हैं। गाय के गोबर की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। गाँवों में भी आज गायें कम भैंसें ज्यादा दिखती हैं। वहाँ भी होली का विकृत रूप ही हमें देखने को मिलता है। सच तो यह है कि होली की अपेक्षा आज हम उन्मादवाली दुल्हंडी (होली से अगले दिन) को होली मानते हैं, न कि होली यज्ञ को। सरकारी छुटी दुल्हंडी की होती है, न कि 'होली' की। शायद आज के युग की यही माँग है। ओर इसी कारण से आज भी मंदिरो में सामुहिक यज्ञ का आयोजन किया जाता है जिनमे लोग अपनेनुसार नारियल या फिर ओर चीजो को दान करता है  ओर मंदिरों ने ही हमारी इस अनमोल यज्ञोपवीत को संभाल के रखा है 


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