हिंदू विवाह-विज्ञान आत्माओं का मिलन ?

पुनर्जन्म सनातन चिंतन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। इस जन्म में हम जो एक दूसरे से संबंध स्थापित करते हैं, वे हमें आनेवाले अगले किसी जन्म में जोड़ते हैं। संबंधों का यह संयोग और विग्रह भारतीय दर्शन में 'तऋणबंध' कहलाता है। इतिहास के पूर्वकाल में जब समाज व्यवस्थित नहीं था, तो स्त्र- पुरुष के बीच कोई निश्चित संबंध भी नहीं था। वह समाज मातृवत् था, क्योंकि पिता सुनिश्चित नहीं होता था। उस समय एक सामाजिक जागरूक व्यक्ति श्वेतकेतु ने इस अव्यवस्थित स्थिति को व्यवस्थित रूप दिया। बाद में समाज चिंतकों ने उस व्यवस्था को और निखारकर धर्म सूत्रों में बाँध दिया और इन प्रकार मातृवत् समाज पितृवत् बन गया । वहीं से आरंभ हुई आज की कुटुंब व्यवस्था। कुटुंब और गृहस्थी ऐसे दर्शन हैं जो दुनिया में कुछेक समाजों में ही देखे जाते हैं। विवाह हिंदू समाज का एक महत्त्वपूर्ण संस्कार है। यह मात्र संस्कार ही नहीं, एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व भी है, जो उसे राष्ट्र, समाज और परिवार के प्रति निभाना होता है। राष्ट्र, समाज और परिवार के लिए उत्तरदायित्ववाला दर्शन विश्व में अन्यत्र नहीं देखा गया है। स्त्री-पुरुष में जो स्वाभाविक अपूर्णता है, विवाह उसे पूर्ण करता है विवाह है मिलन दो आत्माओं का, दो परिवारों का। भारतीय मनीषियों ने विवाह संस्कार को एक ऐसी साफ-सुथरी गृहस्थी देनेवाला माना है जैसे किसी योगी की समाधि । एक-दूसरे के लिए करत्तव्य, प्रेम, त्याग, विश्वास, समर्पण और निष्ठा इस संबंध की नींव में होते हैं, और जब इस संबंध में ये भावनाएँ नहीं होंगी तो वही होता है जो आजकल समाज में हमें देखने को मिल रहा है। अब राष्ट्र, समाज और परिवार के प्रति युवकों का वह उत्तरदायित्व नहीं देखा जाता। अज महत्त्वपूर्ण है ' अहंकार' और 'मैं'। फलस्वरूप परिवार टूट रहे हैं। हिंदू विवाह के विधान वैदिक संस्कारों से निकले और बने हैं। एक-दूसरे को विवाह सूत्र में बाँधने से पूर्व स्त्री- पुरुष दोनों की जन्मकुंडली मिलाना जरूरी हैं। इसी प्रकार यदि दोनों की 'योनि' एक प्रकार की होंगी तो संतान उत्पत्ति में बहुत कठिनाई आएगी। एक गोत्र में विवाह होने पर संतान शारीरिक रूप से दुर्बल होगी कुंडली मिलाते समय वैवाहिक जीवन के अनेक पहलुओं पर विचार किया जाता था। कुंडली मिल जाने पर सगाई होती है। इस अवसर पर वर का तिलक और वधू की गोद धराई होती है। शादी से पहले कन्या बहन और बेटी होती है। अब उसे
पत्नी व माँ बनना है, इसलिए गोद भराई के द्वारा आशीर्वाद के रूप में पाँच शुभ पदार्थ उसके आँचल में देकर गोद
भरते हैं। शादी से पहले एक और रस्म होती है-'हलदी' । यह वर-वधू दोनों को लगाई जाती है। इसका लेप आकर्षण के
अलावा वर-वरधू को उत्तेजना भी देता है। कन्यादान के समय भी पिता पुत्री के हाथों में हलदी लगाता है। इसके पीछे
कन्यापक्ष का भाव यह है कि अब तक हमारी बेटी कन्या थी, अब से गृहलक्ष्मी होगी विवाह के समय गठबंधन एक और रस्म होती है। इस रस्म में वधू की साड़ी के एक कोने को एक पीले दुपट्टे से बाँध दिया जाता है और दुपट्टे को वर के कंधे पर रख दिया जाता है। इसका आशय है दोनों शरीरों और मन को
एक संयुक्त इकाई का रूप देना। बंधन की गाँठ में पाँच वस्तुएँ रखकर बाँधी जाती हैं- -पुष्प, हलदी, अक्षत, दूर्वा और पैसा। इन पाँच वस्तुओं के अपने आशय होते हैं। पुष्प-ये प्रतीक होते हैं, पुष्प की भाँति सदैव प्रसन्न व खिले-खिले रहने की कामना के। हलदी-हलदी से आशय है एक-दूसरे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें, सहयोगी रहें और घर-गृहस्थी चलाएँ दूर्वा-दूर्वा कभी निर्जीव नहीं होती, अतः इसमें निहित कामना है कि प्रेम भावना कभी न मुरझाए । एक-दूसरे के मन में प्रेम व आत्मीयता बनी रहे । अक्षत-यह दांपत्य जीवन में अक्षुण्णता और सामाजिक कर्तव्यों को निभाने का प्रतीक है। पैसा- पैसा (सिक्का) रखने से आशय है कि धन पर किसी का एकाधिकार नहीं होगा। दोनों मिलकर परिवार के लिए धन का व्यय करेंगे। हवन के बाद वर-वधू अग्नि के बाई से दाई ओर चार या फिर सात फेरे (परिक्रमा) लगाते हैं। शास्त्रों में चार और परंपरा में सात फेरों का विधान है। ये सात वचन एक अच्छे वैवाहिक जीवन के लिए आधारभूत होते हैं । वर एवं कन्या निश्चित मुहुर्त में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर 'पाणिग्रहण' की रस्म पूरी करते हैं । परंतु आज के बदले हुए युग में यह सबकुछ व्यर्थ लगता है। प्रेम-विवाह का चलन बढ़ता जा रहा है। परंतु इसका परिणाम तलाक के रूप में सामने आ रहा है।


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