गाय का घी में छुपा है विज्ञान ?

सनातन कर्मकांड और साधारण पूज़ा- पाठ में गाय के घी के प्रयोग का विधान है। प्राचीन काल से भारत में गाय के
अतिरिक्त और भी कई ऐसे पशु थे जिनके दूध से घी बनता था। ऐसे में मन में एक प्रश्न उठता है कि गाय के घी में
ऐसा क्या विशेष है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने इसको इतनी प्रमुखता दी है? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि इस मान्यता के पीछे एक वैज्ञानिक सत्य है, जिसके कारण प्राचीन रुषियों ने गाय के घी को ही चुना। यदि हम पाँच-छह प्रकार के भिन्न-भिन्न द्व्यों के दीये जलाएँ तो हमें गाय के घी का वैज्ञानिक
आधार आसानी से समझ आ जाएगा। इस प्रयोग के लिए अलग-अलग बंद कमरों में एक दीया भैंस के घी का, एक ऊँट के घी का, एक बकरी के घी का, एक याक के घी का, एक सरसों के तेल का, एक नारियल के तेल का, एक मिट्टी के तेल का दीया जलाएँ और हर दीये के सामने एक -एक व्यक्ति को बैठा दें और उन्हें उन दीयों की लौ पर एकटक देखने के लिए कहें। आप देखेंगे कि कुछ समय बाद उन सबकी औँखों में जलन शुरू हो जाएगी। कुछ की आँखों में पहले तो कुछ की आँखों में कुछ देर बाद जलन अवश्य पैदा होगी। परंतु जो व्यक्ति गाय के घी के दीये के सामने बैठा होगा, उसकी आँखों में जलन पैदा नहीं होगी, अपितु वह अपनी आँखों में शीतलता महसूस करेगा। इसका वैज्ञानिक कारण है कि गाय के घी के दीये के अलावा दूसरे द्रव्यों से जलनेवाले दीयों से जो धुआँं निकलता है, उसका उत्सर्जन वातावरण और मनुष्य की आँखों के लिए हानिकारक है, कुछ का कम तो कुछ का ज्यादा। परंतु गाय का घी वातावरण व मनुष्य दोनों के लिए हितकर है। यह एक वैज्ञानिक सत्य है, जिसे हमारे मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व जान लिया था। इसके अतिरिक्त गाय के घी से हवन में दी गई आहुति से वातावरण की शुद्धि होती है। यही नहीं, यह परमाणु रेडिएशन से वातावरण की रक्षा करता है। गाय के दृध में सूर्य की किरणों का प्रभाव अधिक होता है, जिसके कारण इसका घी सूर्य की भाँति वातावरण को शुद्ध रखने में सहायक होता है। गाय के घी की इन्हीं विशेषताओं के कारण ऋषि -मुनियों ने इसका चयन सनातन पूजा-पाठ के लिए किया। इस सत्य की छानबीन यदि आधुनिक मानव करना चाहे तो अवश्य करे। पर इस मान्यता को केवल रूढ़िवाद न कहे।

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