हेलो दोस्तों में आपका स्वागत करता हू हमारे अपने ब्लॉग में तो आज हम बात करने वाले है भारतवर्ष में होने वाले त्योहार पर्व के बारे जैसे बिहार में छट पर्व बंगाल में दुर्गापूजा गुजरात मे गरबा जगन्नाथपूरी में रथयात्रा तो उसी प्रकार 12 वर्ष में होने वाला कुंभ आज हम इन्ही पर्व के बारे में बताने वाले है
कुंभ भारत का प्राचीनतम पर्व है। यह भगवान् राम व कृष्ण दोनों से प्राचीन है। भारत में संभवतः इतनी बड़ी संख्या में जनमानस किसी अन्य पर्व में भाग नहीं लेता जितना कि कुंभ में। इतनी बड़ी संख्या में भाग लेने का कारण है कि यह पर्व किसी जाति विशेष, समुदाय विशेष या प्रदेश विशेष के लिए नहीं है। यह पर्व तो समूचे जनमानस के लिए भारत के मनीषियों ने आविष्कृत किया था। पूराणों में लिखी कथा को हम यहाँ नहीं दोहराएँगे अपितू उस कथा के पीछे जो विज्ञान व वास्तविक अर्थ है उस पर चर्चा करेंगे। हम जानते हैं कि ग्रहों का पृथ्वी पर प्रभाव पड़ता है। कहा गया है, कुंभ-पर्व उसी विज्ञान पर आधारित है। सभी जानते हैं कि पूर्ण कुंभ बारह वर्षों के अंतराल पर पड़ता है। इसका कारण यह है कि बारह वर्षों के बाद बृहस्पति ग्रह मेष (Arics) और सूर्य-चंद्र (Capicom) राशियों में होते हैं। आकाश मार्ग में ग्रहों की यह युक्ति विशेष है और जनमानस के लिए हितकर भी, बशतें मनुष्य इस अवसर का सदुपरयोग करे। गणित के आधार पर इन ग्रहों की युक्ति का समय निश्चित किया जाता है। आधुनिक खगोलशास्त्री भी इस गणित को स्वीकारते हैं, पर पृथ्वी पर रहनेवाले प्राणियों पर इन ग्रहों की इस युक्ति का कोई प्रभाव पड़ता है, इस बात को वे पूर्णरूप से नहीं
स्वीकारते। कुंभ में जहाँ ग्रहों की युक्ति का महत्त्व है वहीं नदियों का भी महत्त्व है। पूर्ण कुंभ जो गंगा पर स्थित प्रयाग
(इलाहाबाद) में पड़ता है, महाकुंभ कहलाता है। महाकुंभ के दिन सूर्य, चंकद्र बृहस्पति तीनों का प्रभाव गंगा की जलराशि पर पड़ता है जो उसे दैविक रूप से शक्तिशाली बना देता है। इस दौरान जो प्राणी अपने शरीर को गंगा की जलराशि में हुबोकर पाप-मुक्ति प्रार्था करते हैं, पाप-मुक्त हो जाते हैं और सांसारिक सुखों से युक्त भी। परंतु यहाँ जरूरी है कि गंगा में स्नान करने से पूर्व उन्होंने अपने शरीर व मन दोनों को पापमुक्ति के योग्य तैयार किया हुआ हो। यदि ऐसा नहीं किया गया है तो फिर गंगा में कुंभ स्नान का कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा। पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले इस क्रिया को ढकोसला ही कहेंगे। प्राचीन काल में ऋष-मुनि जब कुंभ के अवसर पर स्नान करते थे तो कुछ दिन पूर्व नदी के किनारे डेरा डालकर व्रत, जप द्वारा अपने शरीर व मन की शुद्धि करते थे और निश्वित समय पर गंगा, गोदावरी या फिर क्षिप्रा नदी में स्नान करते समय भी वे मंत्र जाप करते थे। शरीर को पूर्णरूप से कुछ समय तक गंगा की जलराशि में डुबोकर रखते थे, ताकि कुंभ के शुभ मुहुर्त पर आध्यात्मिक लाभ उठा सकें। कुंभ का विज्ञान यह है कि जब आकाश मार्ग में सूर्य- चंद्र व बृहस्पति ग्रह बारह वर्षों के अंतराल के बाद मिलते हैं तब उनकी इस युक्ति से उस समय विशेष तरंगें निकलकर भारत के प्रयाग भूभाग पर बहती गंगा पर पड़ती हैं । उन विशिष्ट तरंगों के जल से मिलने पर वह जलराशि कुछ समय के लिए दैविक हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति उस समय उस जल में विधिवत् स्नान करता है तो वह अवश्य ही पापमुक्त हो जाता है। विधिवत् स्नान न करने पर उसे मात्र आंशिक फल ही मिलता है। आठरवीं सदी में महाराज हर्षवर्धन यह पर्व बड़ी निष्ठा से मनाते थे और अपनी सारी धन-संपदा दान कर देते थे। इस सत्य का उल्लेख इतिहास में मिलता है। कुंभ का जो रूप हमें आज देखने को मिलता है, वह युग के अनुरूप है, विधि-विधान के अनुसार नहीं। ऐसे में यदि कुंभ के अवसर पर गंगा में स्नान करने पर उनके पाप नहीं कटते तो इसमें गंगा या कुंभ परंपरा का क्या दोष? यह सत्य है कि हर धार्मिक मान्यता को पूरा करने का एक निश्चित ढंग है। यदि हम वैसा नहीं करते तो दोष हमारा है, न कि परंपरा या मान्यता का। परंत् आज आवश्यकता इस बात की है कि पहले हम गंगा को बचाएँ। यदि हमारी भूलों के कारण गंगा ही नहीं
रहेगी तो कुंभ कैसा होगा? इन्ही कारणों के ध्यान में रखते हुए कही न कही कुछ सरकार ने भी गंगामय्या की सफाई का काम किया है ओर बाकी कुछ ऑर्गेनिशन ने ओर हमे भी इन बातों का खयाल रखना चाहिए
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