हम श्राद्ध मनाएँ या नही मनाएं तो क्यों ?

भारतीय संस्कृति की एक बड़ी विशेषता यह है कि हमें अपने उन निकट संबंधियों से भी श्रद्धा भाव से जोड़ेरखती है, जो आज सशरीर न होकर दिवंगत हैं और जिन्हें हम पितरों के नाम से जानते हैं।आश्विन मास के पूर्णमासी से अमावस तक की अवधि को श्राद्धपक्ष के नाम से जाना जाता है। श्राद्ध का
माहात्त्य एवं विधि का वर्णन विष्णु, वाराह, वायु व मत्स्य पुराण एवं महाभारत व मनुस्मृति आदि सनातन शास्त्रों मेंवर्णित है। कृष्णपक्ष की पितृमोक्ष अमावस के दिन सूर्य एवं चंद्र की युति होती हैं। सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करताहै। इन दिनों हमारे पितर यमलोक से अपना निवास छोड़कर सूक्ष्म रूप में मृत्युलोक में अपने वंशजों के निवास-स्थान पर रहते हैं और यह अपेक्षा करते हैं कि उनके वंशज उनके लिए कुछ-न-कुछ तर्पण-अर्पण करें, जिसे पाकरवे तृप्त हों। पुराणों के अनुसार धर्मराज यम का यह वरदान है कि-"पितृपक्ष के दौरान जो मृतात्माओं के लिए अन-जल, तिल आदि अपित करेगा, वह सामप्री मृतात्माओं को, वेजहाँ भी होंगी, अवश्य प्राप्त होगी।
जो आत्माएँ निस्संतान स्वर्गवासी हो जाती हैं, उन मृतात्माओं के लिए यदि कोई व्यक्तिइन दिनों में उनको श्राद्ध तर्पण करता है या जलांजलि देता है तो वह भी उन्हें पहुँचती है। एक अच्छी संतान अपने जीवित माता-पिता की सेवा तो करती ही है, उनके शरीर छोड़ने के बाद भी उनके प्रति श्रद्धा व आदर की भावना रखती है। श्राद्ध-विधि द्वारा हम अपने दिवंगत माता-पिता एवं आन्य संबंधियों, जिन्होंने जीवन भर हमें संसार के योग्य बनाया, के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। श्राद्ध विधि द्वारा हम अपने पितृऋ्ण को चुकाते हैं। यदि हम ऐसा नहीं करते तो मृतात्माएँ अत्प्त रहती हैं और रुष्ट हो जाती हैं, जिसके कारण कु्दुंब में अनिष्ट होने शुरू हो जाते हैं। जैसे परिवार में संतान का पैदा न होना, बेटे-बेटियों का विवाह देर से होना या फिर न होना अआदि। घर-परिवार में कलह होना, धन की कमी होना आदि अनिष्ट घटनाएँ पितरों के रुष्ट होने के कारण से होती हैं। श्राद्ध की अवधि में आनेवाली पृर्णिमा को 'नाना' का श्राद्ध मनाते हैं और अमावस्या के दिन बाकी उन सब पितरों का, जिनकी तिथि हमें मालूम नहीं होती।

हमारे पितृ तृप्त व संतुष्ट रहें, इसलिए पितृपक्ष के दौरान उनकी पुण्य तिथियों पर हम श्राद्ध करते हैं । शास्त्रों में यह भी लिखा है कि हर मास अमावस्या के दिन हमें अपने पितरों के निमित्त कुछ-न-कुछ तर्पण-अर्पण अवश्य करना चाहिए, ताकि वे सदा तृप्त रहें और हमें आशीर्वाद देते रें। पितृलोक के स्वामी भगवान् दत्तात्रेय हैं, जिनमें विष्णुतत्त्व अधिक है। 'श्री गुरुदेव दत्त' मंत्र का जाप मनुष्य को पित्-दोष दूर करने में बहुत सहायक है। मृत्यु के बाद जीवात्मा को अपने कर्मानुसार स्वर्ग या नरक में स्थान मिलता है और पाप-पुण्य के क्षीण होने पर
वह प्राणी पुनः: मृत्युलोक (पृथ्वी) पर आता है। स्वर्ग जानेवाले मार्ग को पित्यान-मार्ग कहते हैं । पित्यान-मार्ग से जानेवाले, पितृलोक से होकर चंद्रलोक में जाते हैं, जहाँ वे 'अमृतान्न' का सेवन करके अपना निर्वाह करते हैं । यह अमृतान्न कृष्णपक्ष में चंद्र की कलाओं के साथ-साथ क्षीण होता रहता है। अमावस तक यह अमृतान्न समाप्त हो जाता है और मृतात्माओं के आहार के लिए कुछ नहीं बचता, इसलिए कृष्ण पक्ष की अमावस के दिन वंशजों को अपने पितरों के लिए आहार पहुँचाना चाहिए, ताकि उस दिन वे भूखे न रहकर तृप्त रहें और अपने वंशजों को आशीर्वाद दें । इसलिए हर अमावस के दिन हमें पितृ-तर्पण अवश्य करना चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य अपने पितृ-ऋरण से भी मुक्त होता है।
इसलाम धर्म में यद्यपि श्राद्ध नहीं मनाते, परंतु शव-ए-बारात के दिन वे भी अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी कब्र पर जाकर फूल चढ़ाते व रौशनी करते हैं तथा कुरान शरीफ का पाठ करते हैं। शव-ए-बारात मुसलमानों के शाहवान महीने में आता है। आधुनिक एवं नास्तिक लोग यह शंका कर सकते हैं कि यहाँ पृथ्वी पर किया दान या तर्पण-अर्पण पितरों को जो
अब बिना शरीर के हैं और किसी अज्ञात लोक में हैं, उन तक कैसे पहुँच सकता है? गुरु नानक देवजी ने जब इस प्रथा पर प्रश्नसूचक चिह्न लगाया था, उसके पीछे उनका भाव यह था कि हमें कोई भी धार्मिक कार्य मात्र आडंबर से नहीं करना चाहिए, बल्कि उस कार्य में श्रद्धा होनी अनिवार्य है । हमारे इस कार्य के पीछे प्रकृति का सूक्ष्म विज्ञान काम करता है, जिसके अनुसार हमारी श्रद्धा, भावना, प्रेम से युक्त तर्पण-अर्पण सुक्ष्म सरूप से हमारे पितरों तक पहुँचता है। एक और ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिन आत्माओं को शरीर प्राप्त नहीं है, वे पिंड रूप में आकाशमंडल में व्याप्त रहती हैं। इन पिंडाकार आत्माओं का कोई पेट नहीं होता और न ही देखने के लिए इनके पास चक्षु होते हैं, पर इनकी सँघने की शक्ति बड़ी तेज होती है।
इसलिए हम जो कुछ पदार्थ खाने-पीने के लिए पितरों को देते हैं, ये पिंडाकार आत्माएँ उनकी सुगंध से अपना पेट भर लेती हैं। प्रकृति इस प्रकार हमारी स्थूल खाद्य सामग्री को हमारे पितरों के प्राप्त करने योग्य बनाती है। इस सत्य की जानकारी के लिए भौतिक बुद्धि की नहीं, अपितु सूक्ष्म बुद्धि की  आवश्यकता है। आज की पीढ़ी इन सब विधानों को अंधविश्वास का नाम देकर अनसुना कर देते है और इसी वजह से कही न कही कुछ हमारी प्राचीन सभ्यताओ का विलोप होने लगा है 

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