तुलसी में होते है ये जादुई गुन ?

तूलसी एक दैविक वनस्पति है, इसलिए तुलसी का सनातन समाज में बहत महत्त्व था। आज भी पूजा-पाठ में तुलसी के पत्तों की जरूरत पड़ती है। पंचामृत व चरणामृत, दोनों में तुलसी के पत्ते अनिवार्य हैं। एक समय था जब भारत के हर घर-आँगन में तुलसी का चौरा (तुलसी लगाने का स्थान) होता था, क्योंकि पवित्रता में तुलसी का स्थान गंगा से भी ऊँचा है। धर्म की दृष्टि से तुलसी में अधिक मात्रा में विण्णु तत्त्व होते हैं, जो पवित्रता के प्रतिक हैं । इसलिए जिन पदार्थो में तुलसी डालते हैं , वे पवित्र हो जाते हैं और क्योंकि इसके पत्तों में ईश्वरीय तरंगों को आकर्षित करने की क्षमता होती है और वे दैवी शक्ति प्रदान करते हैं। तुलसी की माला विष्णु परिवार से जुड़े देवी-देवताओं के मंत्र जाप के लिए प्रयोग में लाई जाती है। तुलसी की माला धारण करने से एक रक्षा कवच बन जाता है। तुलसी के पत्तों-शाखाओं से एक ऐसा रोगनाशक तेल वायुमंडल में उड़ता है कि इसके आसपास रहने, इसे छूने, इसे पानी देने और इसका पीधा रोपने से ही कई रोग नष्ट हो जाते हैं । इसकी गंध दसों दिशाओं को पवित्र करके कवच की तरह प्राणियों को बचाती है। इसके बीजों से उड़ते रहनेवाला तेल तत्त्व त्वचा से छूकर रोम-रोम के विकार हर लेता है। आयुर्वेद के अनुसार तुलसी एक रामबाण पौधा है, जिसका प्रयोग कई प्रकार के शारीरिक कष्टों को दूर करने में होता है। तुलसी दो प्रकार की होती है- -एक साधारण हरे पत्तोंवाली तथा दूसरी श्यामा-तुलसी, जिसके पत्ते छोटे व काले रंग के होते हैं । श्यामा तुलसी पूजा के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती है। इसका औषधि के सरूप में एक और लाभ यह है कि तुलसी के पत्तों में कुछ मात्रा में पारा (मरकरि) होता है। मरकरि एक सीमित मात्रा में शरीर के लिए बहुत हितकारी है, पर दाँतों के लिए हानिकारक। इस कारण तुलसी के पत्तों को साबुत ही निगला जाता है, दाँतों से चबाया नहीं जाता। 'तुलसी' नीम और शहद से भी अधिक गुणकारी है। एक और विशिष्टता तुलसी की यह है कि जहाँ और फूल-पत्तियों की शक्ति मुरझाने पर समाप्त हो जाती है, वहीं तुलसी के पत्तों की शक्ति सूखने पर भी बनी रहती है और ये वातावरण को सात्त्तिक बनाए रखते हैं। अगर घर- आँगन में, सड़क -किनारे या कहीं और तुलसी की बगीची लगा दें तो साँप-बिच्छू अपने आप वहाँ से भाग जाते हैं। इसी कारण, तुलसीवाले घर-आँगन को तीर्थ समान माना जाता है। बिल्वपत्र (बेल के पत्त) भी तुलसी की ही भाँति सदा शुद्ध रहते हैं। जहाँ तुलसी में विष्णुर तत्त्व होता है, वहीं बिल्व पत्र में शिव तत्त्व होता है। इनमें भी सूखने के बाद देवता तत्त्व सदैव विद्यमान रहता है और उसे प्रक्षेपित करता रहता है। बिल्वपत्र के चिकने भाग को नीचे की तरफ रखकर शिव पिंडी पर चढ़ाते हैं। तुलसी का एक नाम वृंदा भी है अर्थात् विद्युत्-शक्ति। इसलिए तुलसी की लकड़ी से बनी माला, करधनी, गजर आदि पहनने की प्रथा सदियों से चली आ रही है, क्योंकि इनसे विद्युत् की तरंगें निकलकर रक्त-संचार में कोई रुकावट नहीं आने देतीं। इसी प्रकार गले में पड़ी तुलसी की माला फेफड़ों और ह्रदय को रोगों से बचाती है। आप में से कुछ को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मलेशिया द्वीप में कब्रों पर तुलसी द्वारा पूजन-प्रथा चली आ रही है, जिसका वैज्ञानिक आधार यह है कि मृत शरीर वायुमंडल में दुष्प्रभाव और दुर्गध नहीं फैलाता। शव को तुलसी-विटप के पास रखने का एक मात्र वैज्ञानिक रहस्य यही है कि शव देर तक सुरक्षित रहता है और मृत शरीर की गंध तुलसी की दुर्गध से दबी रहती है। इजराइल में भी तुलसी के बारे में ऐसी ही धारणाएँ हैं । सूर्य-चंद्र के ग्रहण के दौरान बड़े-बुजर्ग अन्न-सब्जियों में तुलसीदल (पत्ते) इसलिए रखते थे कि सौर मंडल से उस समय आनेवाली विनाशक विकिरण तरंगें खाद्यान्न को दृषित न करें। इस प्रकार ग्रहण के समय तुलसीदल एक रक्षक आवरण का कार्य करता है। तुलसी के पत्ते रात होने पर नहीं तोड़ने का विधान है। विज्ञान यह है कि इस पौधे में सू्यास्त के बाद इसमें विद्यमान विद्युत्- तरंगे प्रकट हो जाती हैं, जो पत्तियाँ तोड़नेवाले के लिए हानिकारक हैं । इससे उसके शरीर में विकार आ सकता है। तुलसी सेवन के बाद दुध नहीं पीना चाहिए। ऐसा करने से चर्म रोग हो जाने का डर है। इसी प्रकार, तुलसी सेवन के बाद पान भी नहीं चबाना चाहिए, क्योंकि तुलसी और पान दोनों ही पदार्थ तासीर में गरम हैं, जो सेवन करनेवाले के लिए हानिकारक हो सकते हैं।



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