सोमंडल के समस्त ग्रह सूर्य के चारों ओर ३६० डिग्री के वृत्ताकार में परिक्रमा करते हैं। सौरमंडल के इस वृत्ताकार को १२ राशियों व २७ नक्षत्रं में विभाजित किया हुआ है। क्योंकि सौरमंडल के ग्रह व नक्षत्र सतत घूमते रहते हैं। इस कारण पृथ्वी पर रहनेवालों पर उनका प्रभाव समयानुसार बदल-बदलकर पड़ता है। सनातन मनीषियों के अनुसार बाह्य ब्रह्मांड मनुष्य के शरीर में भी सुक्ष्म रूप में विद्यमान है। इसलिए बाहय
ब्रह्मांड का आंतरिक ब्रह्मांड पर सतत प्रभाव पड़ता रहता है। यह प्रभाव अनुकूल होगा या प्रतिकूल, यह व्यक्ति विशेष के जन्म के समय की ग्रह -स्थिति पर निरभर करता है। मनुष्य के अतिरिक्त प्रकृति के अन्य पदार्थों पर भी ग्रहों का प्रभाव पड़ता है। किस पदार्थ पर कितना प्रभाव पड़ेगा, यह उस पदार्थ की अपनी प्राकृतिक संरचना पर निर्भर करता है। सनातन ऋषि-मूनियों ने अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला कि प्रकृति में भूगर्भ से निकलनेवाले कुछ विशेष रत्नों में ग्रहों के द्वारा प्रक्षेपित तरंगों को आकर्षित करने की क्षमता है। उनके अनुसार माणिक रत्न सूर्य की तरंगों को, नीलम शनि की, पुष्पराग (पुखराज ) बृहस्पति की, मोती चंद्रमा की, हीरा शुक्र की, प्रवाल ( मूँगा) मंगल की, वैद्दर्य राहु की, गौमेद केतु की तथा पन्ना कुध की तरंगों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं। यह इसलिए होता है, क्योंकि इन र्नों की वेव लेंथ (Wavelength) और ग्रहों की वेव लेंथ एक -दूसरे से मिलती हैं । इस कारण ये एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। जब ब्रमांड में घूमते ग्रह पृथ्वी पर अपना अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं तो कई व्यक्तियों पर उनका वैसा ही प्रभाव पड़ता है। हमारे सनातन ऋषि-मुनियों ने ग्रहों के प्रभाव को कम करने के लिए या बढ़ाने के लिए इन रत्नों को धारण करने का प्रावधान किया है। किस व्यक्ति विशेष को कौन सा रत्न धारण करना चाहिए, यह निश्चित करने के लिए ज्योतिषियों के पास प्रायः लोग जाते हैं। परंतु यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह कि किस व्यक्ति को
कौन सा रत्न धारण करना है और वह भी कितना बड़ा, कब और कैसा धारण करना है, यह सब अपने में एक अलग ही विज्ञान है। यह विज्ञान हर ज्योतिषी दक्षता के साथ नहीं जानता, इसलिए रत्न धारण करनेवालों को इन रत्नों का अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता। इस स्थिति के लिए दोष रत्न-विज्ञान का नहीं, अपितु इनको धारन करानेवाले ज्योतिषियों का है, क्योंकि वे उस व्यक्ति की जन्मकुंडली ठीक से नहीं पढ़ते और रत्न धारण करने को कह देते हैं। किसी रत्न को धारण करने से पूर्व उसे शुभ मुहुर्त पर खरीदना होता है और वह भी उस रत्न से संबंधित दिन को। फिर उसे सही समय पर स्वर्णकार को जड़ने के लिए देना चाहिए।स्वर्णकार को भी र्न सही समय पर अगूठी में जड़ना होता है। अँगूठी या पेनडेल तैयार हो जाने पर ग्रह संबंधी मंत्र जाप करें या करवाएँ और फिर अनुकूल मुहुर्त में उसे धारण करें । इस प्रकार से धारण किया रत्न अवश्य ही फलदायी होता है। रत्न की शुद्धता, गुण-लक्षण व वजन भी महत्तवपूर्ण है। रत्नविज्ञान अपने आपमें पूर्ण है, पर इसमें निहित नियमों का पालन भी जरूरी है, जो इतना आसान भी नहीं। पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में भारत में रत्न-जड़ित अँगृठियों का चलन बहुत बढ़ गया है। आजकल हर नेता, सरकारी अधिकारी, बड़ा व्यापारी या महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति रत्न-जड़ित अँगूठी पहने दिखता है। यही नहीं, गली के हर मोड़ पर आपको ज्योतिषी भी मिल जाएँगे। बस ऐसे ही ज्योतिषाचार्य के कारण रत्न-विज्ञान को ढकोसला व अंधविश्वास कहा जाता है, वरना रत्न-विज्ञान हर कसौटी पर खरा है। हाँ, इसके नियमों का पालन जरूरी है। परंतु आज का मानव हर चीज का तुरंत फल चाहता है, क्योंकि उसे 'फास्ट-फूड' और ' इनस्टेंट' चीजों की आदत हो गई है। ऐसे में रत्नों की अँगूठियाँ मात्र आभूषण बनकर रह गई हैं।
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