सनातन शिष्टाचार में एक नियम यह है कि हमें किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। इस मान्यता के पीछे "शब्द- विज्ञान' का एक नियम कार्य करता है शब्दों में अपनी एक आंतरिक शक्ति होती है। जब हम बोलते हैं तो वायु द्वारा शब्दों को तरंगों के साथ बाहर फेंकते हैं । जब ये वायु-तरंगें सुननेवाले के कानों में पड़ती हैं तो वह उन शब्दों के आंतरिक अर्थ के अनुसार अनुकूल या प्रतिकृल प्रतिक्रिया करता है। जब हम किसी की चापलूसी या प्रशंसा करते हैं तो सुननेवाला खुश होता है। और जब हम किसी को अपशब्द कहते हैं तो वह दुःखी, आहत या फिर उत्तेजित हो जाता है। इस प्रकार केवल शब्दों के प्रयोग मात्र से हम दूसरों पर प्रभाव डालते हैं । सूर्य-विज्ञान के अनुसार संसार में अड़तालीस प्रकार की वायु हैं, जिनमें से हमारे शरीर में पाँच प्रकार की वायु वास करती हैं, जो हमारे शरीर के विभिन्न अंगों में वास करती हैं । उड़ान-वायु मनुष्य के मस्तिष्क में वास करती हैं और वाणी की अभिव्यक्ति का कार्य निभाती हैं। प्रकृति के नियमों में एक नियम यह भी है कि 'जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा' और कौन कैसा कर रहा है, इसका हिसाब प्रकृति अपने आप रखती है। कौन अच्छा कर रहा है या बुरा, यह निर्णय करने का अधिकार प्रकृति या ईश्वर का है। जब हम किसी व्यक्ति की बुराई या निंदा करते हैं तो हमारा यह कृत्य प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप है, और फिर वह इसके लिए हमें दंडित करती है। उड़ान-वायु, जो वाणी द्वारा हमारे मन के भावों की अभिव्यक्ति करती है, में अगनि-तत्त्व होता है, जो निंदित व्यक्ति के पाप को जलाकर भस्म कर देती है और पलटकर उसका प्रभाव उलटा निंदा करनेवाले पर डालती है। इस प्रकार निंदक स्वयं ही अपने शब्दों का शिकार हो जाता है। इसी विज्ञान के आधार पर मनीषियों ने कहा है कि कभी किसी की बुराई मत करो, क्योंकि इसका उलटा असर पड़ता है। इसी नियम के आधार पर ईसाई मत में 'पाप की आत्म स्वीकृति' (Confession) का नियम है। जब मनुष्य से कोई पाप हो जाए तो उसके प्रभाव से बचने के लिए चर्च में जाकर मुखर वाणी से अपने पापकृत्य को बोलकर स्वीकार करना होता है। ऐसा करने से प्रकृति आपको क्षमा कर देगी। ईसाई धर्म की इस मान्यता में भी उड़ान-वायु में जो अग्नि तत्त्व है, वह कार्यरत होता है। जब आप बोलकर अपना पाप स्वीकारते हैं तो वाणी उसके प्रभाव को जलाकर भस्म कर देती है और आप पाप-मुक्त हो जाते हैं। 'कन्फेशन' के पीछे यही शब्द विज्ञान है । शब्द-विज्ञान से जुड़ी एक और मान्यता यह है कि 'हमें कभी किसी को अपना गुरु मंत्र नहीं बताना चाहिए। और न ही 'हमें कभी अपने द्वारा किए गए शुभ, हितकर और अच्छे कार्यों को किसी को बताना चाहिए', ऐसा करने से हमारे गुरु मंत्र की शक्ति समाप्त हो जाती है। गुरु मंत्र बताने का अर्थ है कि आपने अपना 'पास-वर्ड"न(Password) किसी को दे दिया- अर्थात् अपनी जमापूँजी दूसरे को दे दी। अपने अच्छे कारयों का वर्णन करके जो कुछ पुण्य आपने कमाया था, गँवा दिया। इसके पीछे भी उड़ान-वायु का भस्म कर देनेवाला विज्ञान ही है। आज के इस दिखावेवाले युग में हम धर्म को फैशन मानते हैं। इसलिए सच्ची श्रद्धा न होने पर भी दिखाने के लिए गीता पाठ, सत्संग आदि में खुब सज-सँवरकर जाते हैं। हम दान थोड़ा करते हैं पर उसका ढिंढोरा ज्यादा पीटते हैं। दूसरों की बुराई करने में हमें आनंद मिलता है। अपने द्वारा किए पाप हम मन के सबसे नीचेवाले लॉकर में छुपाते हैं और अपने गुणों का बखान करते हैं । ऐसे में यदि सबकुछ होने पर भी हमारे मन में शांति नहीं है तो आश्चर्य कैसा?
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