घर-आगन में रंगोली सजाने के पीछे का विज्ञान ?

किसी भी शुभ अवसर पर घर-आँगन में रंगोली सजाने की बड़ी प्राचीन प्था रही है। रंगोली सजाने के पीछे पृथ्वी-तत्त्व से जुड़ा विज्ञान है। इसलिए इसे विधिपूर्वक और सही पदार्थों से ही बनाना चाहिए, केवल सौंदर्य या सजावट के लिए नहीं, जैसा कि आजकल प्राय: देखने को मिलता है। रंगोली का मुल संस्कृत शब्द ' रंगवल्ली' है। विशिष्ट चावल का सफेद चूर्ण चुटकी में लेकर जमीन पर उसके द्वारा निर्माण की गई आकृति को रंगोली कहते हैं। रंगोली मूर्तिकला व चित्रकला से भी प्राचीन है। किसी भी धार्मिक अथवा मंगलकारी कार्य में रंगोली का निर्माण होता है। प्राचीन काल में हर घर के दरवाजे के समाने प्रतिदिन पानी छिड़ककर रंगोली बनाने की प्रथा थी। महाराष्ट्र व दक्षिण भारत में आज भी यह प्रथा प्रचलित है। जमीन पर झाड़ लगाकर पानी छिड़कने के बाद उस पर रंगोली की चार रेखाएँ खींची जाती हैं। साफ की गई जमीन बिना रंगोली के अशुभ मानी जाती है। रंगोली में जो आकृतियाँ निकाली जाती हैं, वे प्रतीक के तौर पर होती हैं। उदाहरण के लिए, शंख, स्वास्तिक, चंद्र , सूर्य, कमल लक्ष्मी का व प्रजनन-शक्ति का प्रतीक है। वैष्णव उपासना में उसका विशेष महत्व है। रंगोली को चावल के चूर्ण से बनाया जाता है। चावल में नकारात्मक तत्त्वों को नष्ट करने की प्राकृतिक क्षमता होती है। यही कारण है कि जब किसी को तिलक लगाते हैं तब भी चावल का ही प्रयोग होता है। चावल नकारात्मकता को दूर करता है और जिसका तिलक करते हैं, उसकी रक्षा होती है। जमीन पर झाड़ लगाते समय तथा पानी छिड़कते समय जमीन पर सूक्ष्म-रेखाएँ बन जाती हैं, जिनके द्वारा जमीन में एक प्रकार का कंपन पैदा होता है, क्योंकि ये रेखाएँ अनियमित होती हैं, इसलिए उनसे होनेवाले कंपन भी अनियमित होते हैं। ये अनियमित कंपन शरीर, नेत्र व मन के लिए हानिकारक होते हैं। इनसे बचने के लिए साफ की गई जमीन पर रंगोली के माध्यम से कोण व न्य शुभ चिहन व्यवस्थित रूप से उसके ऊपर बनाए जाते हैं, जिससे अशुभ परिणाम दूर हो जाते हैं और शुभ परिणामों की प्राप्ति होती है। यही है रंगोली सजाने के पीछे का विज्ञान। पर आजकल तो घर-औँगन कच्चे होते ही नहीं। ऐसे में रंगोली का क्या प्रयोजन रह जाता है, यह शोध का विषय है।




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