पूजा में पान-सुपारी के चमत्कारी उपयोग ?

पान-किसी भी सनातन पूजा-पाठ में पान-सूुपारी उसके अभिन्न अंग हैं। इन दोनों पदार्थों में अपने-अपने विशिष्ट गुण हैं, जिनके कारण इन्हें हर पूजा-पद्धति में प्रयोग किया जाता है। पान की बेल को 'नागर बेल' भी कहते हैं। पान की बेल बहत सात्विक होती है। यदि रज:ख्राव स्थिति में कोई स्त्री नागर बेल के पत्ते तोड़ लेती है तो वह बेल जल जाती है--अर्थात् उसके पत्तों पर काले दाग उभर आते हैं। अपनी संवेदनशीलता के कारण नागर बेल के आस- पास सात्त्विक वायुमंडल ऐसी स्त्री की देह से प्रक्षेपित रज-तमात्मक तरंगों के प्रभाव के कारण वहाँ के वायुमंडल की सात्त्विकता का विघटन हो जाता है और वह जल जाती इसके विपरीत, पान के पत्ते के द्वारा हम वायुमंडल से दैविक तरंगों को अपनी ओर खींच सकते हैं। इन दैविक तरंगों को ग्रहण करने के लिए पान के पत्ते में उसका डंठल बहुत जरूरी है। बिना डंठल का पान का पत्ता उपयोगी नहीं रहता। इसीलिए पान के पत्ते के डंठल को देवी-देवता की तरफ करके ही अर्पण किया जाता है, क्योंकि डंठल के द्वारा ही पान का पत्ता देव कण को अपने में समाविष्ट करता है। पान का पत्ता भूलोक व ब्रह्मलोक को जोड़ने की कड़ी का कार्य करता है। नागर बेल में भूमि-तरंगें व व्रह्म-तरंगें आकृष्ट करने की क्षमता है। पान का पत्ता औषधि के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमें पौष्टिक गुण हैं, इसीलिए विवाह के समय वर- वधू को पान खिलाने की प्रथा भी प्रचलित है। सुपारी-सुपारी दो प्रकार की होती है- एक लाल, जो गोल सी होती है और दूसरी श्वेत, जो अंडाकार होती है। अंडाकार श्वेत सुपारी पूजा के लिए अधिक उपयुक्त है। सुपारी में पृथ्वी व आप (जल) तत्त्वों के कणों का सुंदर संयोग होता है। सुपारी में विद्यमान आप तत्त्व (जल तत्त्व) के कण उसमें विद्यमान देव कणों को प्रवाही बनाते हैं। लाल सुपारी की अपेक्षा श्वेत सुपारी का प्रयोग अधिक फलदायक माना गया है, क्योंकि श्वेत सुपारी में देवताओं के तत्त्व आकृष्ट करने की और सात्त्तिक तरंगों को प्रक्षेपित करने की अधिक क्षमता होती है। पान-सुपारी के इन्हीं विशेष गुणों के कारण ये दोनों पूज़ा-पाठ के अभिन्न अंग हैं।


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