नमस्ते दोस्तो आज हम इस पोस्ट मद बात करने वाले देवो के देव महादेव के बारे में जिन का न कोई जन्म है ना कोई अंत जो निराकार है आपने देवालयों में भक्तों को देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की प्रदक्षिणा करते हुए देखा होगा। प्रदक्षिणा के पीछे जो विज्ञान है वह यह है कि जब कोई व्यक्ति किसी जाग्रत् प्रतिमा के चारों ओर घूमता है, तब देव-शक्ति उसके शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रवेश करती है और उसे कष्ट वहन करने की शक्ति देती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जाग्रत् प्रतिमा किसी सिद्ध स्थल की हो। आम मंदिरों में स्थापित प्रतिमाओं के विषय में यह तथ्य सत्य है, इसका दावा संभवत: नहीं किया जा सकता। जहाँ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा की पूर्ण परिक्रमा उनके चारों ओर घूमकर पूरी की जाती है, वहीं शिवपिंडी की प्रदक्षिणा केवल आधी (अपूण) ही की जाती है
क्यों सबसे पहले हम ये जान लेते है के शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुए और क्या है इसका अर्थ ?
शिवलिंग के शब्द अर्थ की बात की जाए तो ‘शिव’ का अर्थ है ‘परम कल्याणकारी’ और ‘लिंग’ का अर्थ होता है ‘सृजन’। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिंह या प्रतीक होता है। इस तरह शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक। भगवान शिव को देव आदिदेव भी कहा जाता है। जिसका मतलब है कोई रूप ना होना। भगवान शिव अनंत काल और सृजन के प्रतीक हैं। ओर कैसे हुए उत्पत्ति
लिंगमहापुराण के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद हो गया। जब उनका विवाद बहुत अधिक बढ़ गया, तब अग्नि की ज्वालाओं के लिपटा हुआ लिंग भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच आकर स्थापित हुआ था, दोनों उस लिंग का रहस्य नहीं समझ पाए। इस रहस्य के बारे में विष्णु भगवान और ब्रह्मदेव ने हजार वर्षों तक खोज की फिर भी उन्हें उस लिंग का स्त्रोत नहीं मिला। निराश होकर दोनों देव फिर से वहीं आ गए जहां उन्होंने लिंग को देखा था। वहां आने पर उन्हें ओम की ध्वनि सुनाई दी, जिसको सुनकर उन्हें अनुभव हुआ कि कि यह कोई शक्ति है और उस ओम के स्वर की आराधना करने लगे। भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु की आराधना से प्रसन्न होकर उस लिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और सदबुद्धि का वरदान दिया। देवों को वरदान देकर भगवान शिव चले गए हो गए और एक शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए। यही भगवान शिव का पहला शिवलिंग माना गया। सबसे पहले भगवान ब्रह्मा और विष्णु ने शिव के उस लिंग की पूजा-अर्चना की थी। तब से भगवान शिव की लिंग के रूप में पूजा करने की परम्परा की शुरुआत मानी जाती है।
शिवलिंग की परिक्रमा करने का सही विधान इस प्रकार है- प्रदक्षिणा करते समय बाई ओर से जाएँ और जहाँ तक अभिषेक की जल-प्रणालिका (शिवपिंडी का आगे निकला हुआ भाग) होती है, वहाँ तक जाकर उसे न लाँघते हुए पुनः लौटना चाहिए तथा पुनः प्रणालिका तक उलटे आकर प्रदक्षिणा पूर्ण करनी चाहिए । यह नियम केवल मानव स्थापित अथवा मानव निर्मित शिवलिंग पर ही लागू होता है; स्वयंभू लिंग या चल-लिंग (घर में स्थापित लिंग) पर नहीं। शालुंका के स्त्रोत लाँघते नहीं, क्योंकि वहाँ शक्ति-खरोत होता है। पिंडी लाँघते समय पैरों को फैलाना पड़ता है, अत: वीर्य निर्माण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे शरीर की देवदत्त व धनंजय वायु के प्रवाह में भी बाधा पैदा हो जाती है, जो शरीर के लिए कष्टदायी है। भारतीय मान्यता के अनुसार मनुष्य के शरीर में कई प्रकार की वायु होती हैं, जिनका अपना-अपना कार्य होता है। देवदत्त व धनंजय वायु मनुष्य की यौन
इंद्रियों से संबंध रखती है। पिंडी लाँघने पर मनुष्य को शक्तिपात के कारण शारीरिक कष्ट हो सकता है। इसलिए शिवपिंडी की पूर्ण प्रदक्षिणा नहीं की जाती और यही इसका विज्ञान है। ओर इसी कारणवश शिवलिंग की परिक्रमा कभी भी पूरी नही करनी चाहिए
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हर हर महादेव शिवकृपा हमपर सदा बनी रहे 🙏