विश्व के वैज्ञानिक मानते हैं कि गंगाजलकीटाणुनाशक है क्यों ?

भारत में तो अनेक नदियाँ हैं और सभी पावन हैं, पर ' गंगा' सर्वोच्च है। गंगा नदी संसार की सभी नदियों में से विशिष्ट है। यह तथ्य अब विश्व के वैज्ञानिक भी स्वीकारते हैं। उन्होंने संसार की लगभग समस्त नदियों के जल का परीक्षण किया और पाया कि गंगाजल के अतिरिक्त किसी और नदी के जल में रोगाणुओं को नष्ट करने की शक्ति नहीं है। इसी कारण, हिंदू अंतिम संस्कार के बाद अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित करते हैं, ताकिे यदि उनमें किसी भी प्रकार के रोग के कीटाणु शरीर में शेष रह गए हैं तो वे गंगाजल में समाविष्ट होकर नष्ट हो जाएँ।
सन् १९४७ में जर्मनी के जलतत्त्व विशेषज्ञ कोहीमान भारत आए थे। उन्होंने वाराणसी से गंगाजल लिया और उस जल पर अनेक परीक्षण करके एक विस्तृत लेख लिखा। जिसका सार था '"इस नदी के जल में कीटाणु- रोगाणुनाशक विलक्षण शक्ति है, जो संसार भर की किसी और नदी के जल में मेरे देखने में नहीं आई। " इससे पहले सन् १९२४ में बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवन ने दुनिया की तमाम नदियों के जल का विश्लेषण करने के बाद यही निष्कर्ष निकाला था"गंगाजल विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और कीटाणू -रोगाणुनाशक जल है।" फ्रांसीसी
चिकित्सक हेरल ने भी यही अनुभव किया कि गंगाजल से कई रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। रुड़की विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का मानना है कि " गंगाजल में जीवाणु-नाशक और हैजे के कीटाणुनाशक तत्त्व विद्यमान हैं। "गंगाजल के इस भौतिक लाभ के अतिरिक्त जो अलौकिक लाभ मनुष्य को होता है, उसका वर्णन पुराणों में है, जिनके अनुसार इसे सतत पीनेवाले में सात्त्विक वृत्ति का संचार होता है, आनंद व शांति मिलती है तथा पापों का नाश होता है। उपर्यक्त कारणों से हम जब किसी भी वस्तु पर गंगाजल छिडकते हैं तो इस कृत्य को धार्मिक भाषा में 'पवित्रीकरण' कहते हैं और यदि आधुनिक भाषा में कहें तो उसे ' डिसइन्फेक्ट' करना कहेंगे। पूजा-पाठ या हवन
आदि करने से पहले उस स्थान पर गंगाजल छिड़कने का उद्देश्य उस स्थान को पवित्र करना होता है। मरते हुए
व्यक्ति के मुख में गंगाजल उसके पापों को कम करने के लिए डाला जाता है, ताकि उसका कष्ट कम हो। गंगोत्तरी भारत के ऐसे देशांतर और अक्षांश (Longitude and latiude) पर स्थित है जहाँ आकाश से विशेष रूप से बृहस्पति ग्रह की रश्मियाँ व तरंगें सत उस हिमखंड पर पड़ती रहती हैं, जिसके कारण उस हिमखंड से पिघलनेवाला जल पापनाशक व रोगनाशक बन जाता है और यही कारण है कि 'गंगाजल' अन्य नदियों के जल से भिन्न है। बृहस्पति ग्रह की तरंगें गंगोत्तरी हिमखंड को प्रभावित करके पवित्र कर देती हैं । दिन में सूर्य की किरणें हिमखंड को पिघलाती हैं और रात में चंद्रमा की रश्मियाँ (शिव-तत्त्व) उसे जमा देती हैं । इस प्रकार प्रतिदिन यह क्रम चलता है, जो गंगाजल को विशिष्ट बना देता है। यह बात तो अब वैज्ञानिक भी मानते हैं कि यदि साधारण जल
को हम सौ बार डिस्टिल (Distil) करें तो वह जल विशिष्ट हो जाता है। यहाँ तो गंगाजल हर रोज प्रकृति द्वारा प्राकृतिक ढंग से डिस्टिल होता रहता है। तो फिर यह अदभुत व चमत्कारी हैं तो आश्चर्य कैसा? पर अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण गंगोत्तरी का अस्तित्व ही खतरेमें है। हमारे ऋषि-मुनियों ने गंगा के जल की इस विशिष्टता को हजारों वर्ष पूर्व जान लिया था और इसीलिए गंगा को भारत के जनमानस से पूर्णरूप से जोड़ दिया। पर इस सत्य से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि गंगा की जो स्थिति आज देखने को हमें मिलती है, उससे गंगाजल की पवित्रता पर प्रश्नसूचक चिह्न गंगा का नहीं, हमारा है, जो उसे इतना गंदा रखते हैं । पर आज भी यदि हरिद्वार से ऊपर जाकर गंगाजल लिया जाए तो वह पवित्र ही होगा। खेद है कि हम अपनी इस धरोहर को बचाने का कोई सार्थक व सकारात्मक प्रय नहीं कर रहे हैं । पिछले कई वर्षों से काँवड़िया लाखों की संख्या में गंगोत्तरी तक जा रहे हैं । इस कारण वहाँ प्रदूषण फैला रहा है, लेकिन प्रदूषण-नियंत्रण की समुचित व्यवस्था नहीं की जाती। जिससे गंगोत्तरी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि गंगा की पवित्रता को बनाए रखा जाए। इस दिशा में सार्थक पहल बहुत जरूरी है। 



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