पूजा-पाठ में चंदन का प्रयोग करते हैं?

पुजा-पाठ में देवताओं को तिलक लगाने के लिए विविध प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है, उनमें से अष्टगंध व चंदन सबसे अधिक सात्व्विक हैं। देव के माथे पर तिलक लगाने के पीछे यह विज्ञान है कि देवता की सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय होकर मनुष्य यानी पूजक की आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति करें।
कर्मकांड के अनुसार, सकाम साधना में दोनों हाथों से चंदन धिसने की प्रक्रिया को महत्त्व दिया है । किसी भी कार्य की संपूर्ण सिद्धि के लिए उस शिव (बाएँ) व शक्ति (दाएँ) को जोड़ना आवश्यक है। जब हम दोनों हारथों से चंदन घिसते हैं तो शिव व शक्ति दोनों के तत्त् अपने में जाग्रत् कर लेते हैं। दोनों हाथों से चंदन घिसने पर शरीर की सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय हो जाती है, जो मनुष्य के लिए हितकर है।इसके विपरीत, मृत व्यक्ति के लिए दाएँ हाथ से चंदन घिसने का विधान है। दाएँ हाथ से चंदन घिसकर दाहिनी नाड़ी (पिंगला नाड़ी) द्वारा मृत शरीर की लिंगदेह को क्रियाशक्ति प्रदान कर उसकी आगे की अनंत यात्रा के लिए गति देना है। हमारे प्राचीन शरीर-विज्ञान के अनुसार प्राण निकल जाने के बाद भी मृत शरीर में कुछ मात्रा में सुप्त उपप्राण कुछ समय तक शेष रहते हैं । आधुनिक वैज्ञानिक भी अब यह मानते हैं कि मरने के बाद कुछ समय तक मनुष्य का मस्तिष्क जीवित रहता है। यही कारण है कि हिंदुओं में मृतक को चिता पर अग्निदाह के समय कपाल- क्रिया की जाती है, ताकि उसकी खोपड़ी में स्थित उपप्राण शीष्र मुक्त होकर पंचतत्त्व में विलीन हो जाएँ । चंदन के इस गुण के कारण चिता पर चंदन की लकड़ी के टुकड़े चढ़ाए जाते हैं । दाएँ हाथ से चंदन घिसनेवाले व्यक्ति की सूर्यनाड़ी (दाई) सक्रिय होती है और इस प्रकार उसके शरीर से रजोगुणी तरंगें निकलकर मृत व्यक्ति की देह को प्राप्त होती हैं, जो उसके उपप्राण को शी्र उसके मृत शरीर से निकलने में सहायक बनती हैं । चंदन में सात्त्कता होती है, जो मनुष्य की आध्यात्मिकता के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए दोनों भूकुृटि के बीच माथे पर चंदन का तिलक लगाने की प्रथा है। परंतु यदि हम सफेद चंदन में हलदी या कुंकृम मिलाकर घिसें तो उसकी सात्विकता कम हो जाती है, क्योंकि हलदी व कुंकुम में रजोगुणी तरंगें होती हैं, जो चंदन के सत्त्वकणों का विघटन कर देती हैं । इसलिए चंदन घिसते समय उसमें हलदी या कुमकुम नहीं मिलाना चाहिए। जब हम किसी देव प्रतिमा या चित्र पर देव की भ्रमध्य में चंदन का तिलक लगाते हैं तो उस देवता की सूर्यनड़ी जाग्रतु हो जाती है। इससे देवता का तत्त्व उस प्रतिमा अथवा चित्र की ओर आकृष्ट होता है और वे जाग्रत् हो जाते हैं तथा आस-पास के वातावरण को आध्यात्मिक बनाते हैं। चंदन के प्रयोग के पीछे यही विज्ञान है।

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