ग्रह-नक्षत्रों का मनुष्य पर प्रभाव सच है या कल्पना ?

प्राचीन चिंतन के अनुसार जो कुछ ब्रह्मांड में व्याप्त है, वह मनुष्य के शरीर के भीतर भी है। सृष्टि की रचना के
समय परमात्मा ने मनुष्य के शरीर की रचना इस प्रकार से की है, जिसमें ईश्वरीय सभी तत्त्व विद्यमान हों। अग्नि
देवता ने वाणी बनकर मनुष्य के मुख में प्रवेश किया और वायु देवता ने प्राण बनकर। इसी प्रकार सुर्य देवता ने
मनुष्य की ँखों में अपना स्थान बनाया, दिशा देवता ने कानों में, बहस्पति देव ने का्या के रोम-रोम में तथा चंद्र
देव ने उसके मन (हृदय) में अपना स्थान बना लिया।
पृथ्वी और ब्रमांड का सनातन संबंध है। भारत के मनीषियों ने संपूर्ण ब्रह्मांड को २७ नक्षत्रों में बाँटा है। ये सभी
अपने-अपने प्रभाव को लिये हुए मन्ष्य के शरीर में भी होते हैं। कृतिका मनुष्य के सिर में, रोहिणी माथे में, नक्षत्र मृगशिरा भौँहों में, आद्रा आँखों में, पुनर्वसु नाक में, पुष्य चेहरे में, अश्लेषा कानों में, मघा होंटों में, पूर्वाफाल्गुनी दाएँ हाथ में, उत्तरा फाल्गुनी बाएँ हाथ में, हस्त अँगुलियों में, चित्रा गरदन में, स्वाति सीने में, विशाखा छाती में, अनुराधा उदर में, ज्येष्ठा जिगर में, मूल कोख में, पूर्वाषाढ़ा पीठ में, उत्तराषाढ़ा रीढ़ की हड्डी में, श्रवण कमर में, शतभिषा दाई टाँग में, रेवती टखनों में, अश्विनी पैरों में ऊपरी हिस्से में और भरणी पैरों के तलवों, घनिष्ठा बाई टॉँग में, पूर्वा भाद्रपद व उत्तरा भाद्रपद मस्तिष्क के दाएँ व बाएँ भाग में स्थित हैं। हमारे सनातन ऋषि -मुनियों द्वारा प्रतिपादित काया-तंत्र के आनुसार मनुष्य के शरीर में एक महीने चंद्र-नाड़ी (स्त्री) प्रधान रहती है और एक महीने सूर्य-नाड़ी (पुरुष)। यही राशि-विज्ञान है, जिसके अनुसार पहली राशि मेष पुरुष होती है तो दूसरी राशि वृषभ नारी। इसी प्रकार अगली मिथुन राशि पुरुष तो उससे अगली कर्क नारी। सिंह पुरुष और कन्या नारी। तुला राशि पुरुष तो उससे अगली वृश्चिक नारी। धनु राशि पुरुष तो मकर नारी और इसी प्रकार कुंभ पुरुष तो मीन राशि नारी। यही भारतीय चिंतन का अर्धनारीश्वर रूप है, जिसमें ईश्वर का आधा हिस्सा पुरुष होता है और आधा नारी। यही काया-विज्ञान यिन और यांग के रूप में चीन देश का दर्शन है और यही आधुनिक विज्ञान के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के सिर का बायाँ और दायाँ हिस्सा है- बायाँ पुरुष और दायाँ नारी। सिर का बारयाँ हिस्सा नारी हिस्सा शरीर के बाएँ हिस्से में तरंगित होता है। दोनों के एक-दूसरे के आकर्षण से यह काया चलती है। इन्हीं का मिलन, इन्हीं का संगम, काया-विज्ञान है। इन्हीं के संगम में जब कुछ रुकावट आती है तो काया में शक्ति का संचार रूक जाता है और इसी शक्ति को प्रवाहित करने के लिए हम पूजा-पाठ, कर्मकांड आदि करते हैं। व्रह्मांड स्थित हमारे सौरमंडल के ग्रह -नक्षत्र जब अपनी स्थिति एक राशि से दूसरी राशि में बदलते हैं तो मनुष्य के शरीर में स्थित जो लघु सुक्ष्म सौरमंडल है, उसमें भी परिवर्तन होता है, जिसका प्रतिकूल या अनुकूल प्रभाव मनुष्य के कारयों व सोच दोनों पर पड़ता है। इन ग्रह-नक्षत्रों की बदलती स्थिति से मनुष्य राजा से रंक या रंक से राजा बन जाता है। यह बदलाव इसलिए होता है, क्योंकि जब बाह्य जगत् के ग्रह -नक्षत्र अपना स्थान बदलते हैं तो मनुष्य के आंतरिक ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव भी बदल जाता है, जिसका आअसर मनुष्य के जीवन और उसकी परिस्थिति पर पड़ता है। यह तथ्य एक सत्य है, कल्पना नहीं। जब ग्रहों का अनुकूल प्रभाव पड़ता है तो उसके फैसले सही होते हैं और वह अवसर का पूरा लाभ उठाकर 'राजा' बन जाता है। इसी प्रकार, जब ग्रह प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। तो मनुष्य के निर्णय गलत हो जाते हैं, परिणामस्वरूम वह हानि उठाता है। जीवन में उठना-गिरना मनुष्य के उचित या अनुचित निर्णय पर निर्भर करता है। इसलिए कहा गया है कि ईश्वर से जब कुछ माँगना हो तो सुबुद्धि माँगिए । गायत्री मंत्र का सार भी ईश्वर से बुद्धि माँगने का है। यदि आपके पास सही बुद्धि है तो आप मिट्टी को भी सोना बना देंगे। ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य की बुद्धि ही तो प्रभावित होती है।


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