शब्दों के समूह विशेष के संयोजन का नाम मंत्र है। मंत्र संयोजित करते समय मंत्रों को बनानेवाले ऋषि एक-एक
अक्षर को बड़ी दक्षता से संयोजित करते थे। यही नहीं, मंत्र को समाज को देने से पहले वे उसका प्रयोग स्वयं पर करते थे और मंत्र सिद्धि के उपरांत ही वे मंत्र वेदों में स्थान पाते थे। ये वैदिक मंत्र कहलाते थे। वैदिक मंत्रों के अतिरिक्त और भी मंत्र हैं, जो उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितने कि वैदिक। मंत्रों के आविष्कार करनेवाले ऋषियों को 'मंत्रद्रष्टा' कहते थे। मंत्रों का विज्ञान ध्वनि, शाब्दिक शक्ति (Sound energy) और वाक् के सिद्धांत पर आधारित है । मंत्रों के शुद्ध उच्चारण से मनुष्य के विशेष अंगों पर प्रभाव पड़ता है, जिससे उसे ऐसी वांछित ऊर्जा प्राप्त होती है, जो उसकी इच्छापूर्ति कराने में सहायक होती है। मंत्र सिद्धि के लिए मनुष्य को एक निश्चित मात्रा और संख्या तक उच्चारण करना होता है। यही नहीं, मंत्र सिद्धि करते समय उस व्यक्ति को अपनी समस्त ऊर्जा को सँजोकर रखना होता है। इसलिए मंत्र सिद्धि के दौरान ब्रहमचर्य का पालन, भूमि-शयन, क्रोध पर नियंत्रण, वाणी का संयमित उपयोग करना आवश्यक होता है। आज मनुष्य की जो जीवन शैली है, उसमें क्या वह इन सब नियमों का पालन कर सकता है? वह मंत्र सिद्धि कैसे भी कर सकता हैं? इसलिए वह मंत्रों को ढकोसला मानता है। दोष मंत्र विज्ञान का नहीं, उसे ठीक ढंग से न करने का है। मंत्र शक्ति प्राप्त करना एक साधना है, एक तपस्या है, जो आज के इस युग में संभव नहीं। प्राचीन
काल में लोगों के पास समय व संयम दोनों थे, पर आज नहीं, क्योंकि युग बदल गया है। दोष युग का है, मंत्र का नहीं। अमेरिका के डॉक्टर हावर्ड स्टेनगल ने गाययत्री मंत्र पर अनसंधान करके पाया कि गायत्री मंत्र के शुद्ध उच्चारण से वायु में प्रतिक्षण १,१०,००० लयबद्ध विद्यृतधारा प्रवाहित होती है। इससे यही सिद्ध होता है कि मंत्रों में अवश्य ही विज्ञान है। मंत्रों द्वारा शब्द-शक्ति से मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा प्रवाहित होती है और वह सिद्धि को प्राप्त होता है। मंत्र में देन शक्ति का बीज छपा होता है, जब कोई व्यक्ति मंत्र उच्चार करता है, तो उस मंत्र की ध्वनि देव शक्ति को प्रकट कर देती है। देव शक्ति के प्रकटीकरण से मनुष्य के दुःख, आपदा, संकट व अन्य सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। मंत्र सिद्धि मनुष्य को बहमांड शक्ति से जोड़ देती है, जिसके कारण मनुष्य को प्रकृति से वह सब मिलने लगता है, जो उसके हित में होता है। मंत्रों के विषय में एक और बात महत्त्वपूर्ण है कि हर मंत्र हर व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। अलग-अलग मंत्र अलग-अलग व्यक्तियों के लिए हैं, जो इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर क्या है। और आध्यात्मिक स्तर को जानने के लिए गुरु का योग्य होना जरूरी है। किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर को जाने बिना मंत्र-दीक्षा देनेवाले गुरुओं के कारण ही हम आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले लोगों के उपहास का कारण बनते हैं । दोष 'मंत्र' का नहीं, देनेवाले गुरुओं का है। पर ऐसे भी कुछ मंत्र हैं, जिनका जाप सभी कर सकते हैं। 'गायत्री मंत्र' उनमें से एक है। इस मंत्र की साधना कोई भी व्यक्ति कर सकता है। फिर भी, यदि कोई सिद्ध गुरु इस मंत्र की दीक्षा दे तो मंत्र प्राप्त करनेवाले का आध्यात्मिक विकास अल्पकाल में ही संभव है; क्योंकि सिद्ध व्यक्ति द्वारा दिया मंत्र जल्दी सिद्ध हो जाता है। प्राचीन काल में जब किसी मंदिर या देवालय के लिए कोई देव प्रतिमा बनाई जाती थी तो उस प्रतिमा को बनानेवाला शिल्पकार उसे तराशते समय मौन रहकर मन-ही-मन उस देवी या देवता के मंत्र का उच्चारण करता रहता था। इस प्रकार मंत्र जाप से वह मूर्ति जाग्रत् हो जाती थी। आयुर्वेद में भी जब किसी बीमार व्यक्ति के लिए
थे तो उस अँगूठी के रत्न को मंत्रों द्वारा धारण (जाग्रत) करते थे। ऐसे ही पौराणिक काल में युद्ध के समय जो बाण मंत्र पढ़कर छोड़े जाते थे, वे उसी लक्ष्य पर लगते थे, जिसका नाम लेकर उसे छोड़ा गया था। ऐसी थी मंत्र-शक्ति। इन सभी प्रथाओं व धारणाओं के पीछे जो विज्ञान है, वह यह कि मंत्र प्रकृति का सुक्ष्म तत्त्व है, जबकि प्रतिमा, औषधि व रत्न स्थूल। मंत्र जाप द्वारा हम "सूक्ष्म' को स्थित कर देते हैं। यही इसका विज्ञान है और यही मंत्र -शक्ति के पीछे का रहस्यमय विज्ञान
जिसे आज कल के लोग युवा मात्र एक ढकोसला मानते है लेकिन आज भी आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनकी बीमारी का इलाज मंत्र शक्ति से किया गया है और कुछ आज भी इन चीजों पर विश्वास करते है
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