नवरात्रों का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक रहस्य ?

नवरात्र' शब्द से विशेष महत्त्व रखनेवाली नौ रात्रियों का बोध होता है। इस काल में 'आदि शक्ति' के नौ रूपों की पूजा दिन से रात्रि-पर्यत की जाती है। 'यात्र' शब्द सिद्धि का प्रतीक है। भारतीय ऋषि-मुनियों ने रात्रि को आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। यदि रात्रि का कोई वैज्ञानिक रहस्य न होता, तो ऐसे विशेष उत्सवों को रात्रि न कहकर दिवस कहा जाता। किंतु दीपावली को दिन नहीं महारात्रि कहकर संबोधित किया जाता है। इसी प्रकार अन्य महारात्रियों में होलिका-महारात्रि और शिव-महारात्रि भी महत्त्वपूर्ण हैं । इसका वैज्ञानिक कारण है, दैविक शक्तियों का रात्रि में अधिक सक्रिय होना, क्योंकि दिन में सूर्य की किरणें दैविक तरंणों को छिन-भिन्न कर देती हैं। भारतीय मनीषियों ने वर्ष में दो बार विशेष खूप से नवरात्रों का पर्व मनाने का विधान बताया है। सर्वप्रथम विक्रम संवत् के प्रारंभ के दिन से अर्थात् चैत्र मास शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात् नवरात्री तक नवरात्र निश्चित किए गए हैं । इसी प्रकार ठीक छह मास बाद शारदीय-नवरात्र हर दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण व फलदायी माने गए हैं । इसका कारण हैं सौरमंडल में पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति। इन दिनों सूर्य से प्रक्षेपित तरंगें कोमल होती हैंं और सात्विक तरंगों को अधिक छिन्न-भिन्न नहीं कर पार्तीं यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि दोनों नवरात्र ऋतुओं के संधिकाल में आते हैं जब एक ऋतु से दूसरी ऋतु में परिवर्तन होता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि संधिकाल में आकाशमंडल में ग्रहों की स्थिति व वातावरण दोनों मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के लिए उपयुक्त होते हैं। ऋत्-परिवर्तन के कारण मनुष्य के शरीर की रासायनिक रचना में परिव्तन होता है। यही कारण है कि इन नौ दिनों में व्रत करना हितकर है, क्योंकि व्रत करने से हमारे शरीर की ऊर्जा बढ़ती है, जो हमारे स्थूल व सुक्ष्म दोनों शरीरों पर प्रभाव डालती है। यही  नवरात्रों का आध्यात्मिक रहस्य है।


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