वास्तुशास्त्र जान लो नही तो हो सकता है बुरा ?

वास्तुशास्त्र एक प्राचीन विज्ञान है। वर्तमान काल में इसका महत्व और भी बढ़ गया है, क्योंकि जनसंख्या की वृद्धि, भौतिक साधनों की प्रचरता और महानगरों में आवासीय समस्याएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। आज सीमित भू-भाग में बने आवास और गगनचुंबी अट्टालिकाएँ कुकुरमुत्तों सी फैल रही हैं। विडंबना है कि भौतिक समृद्धि के बावजूद मनुष्य की मानसिक शांति और वास्तविक सुखानुभूति कम होती जा रही है, जिसका एक कारण यह भी है कि हमने भौतिकता की दौड़ में पाश्चात्य जीवन-शैली का अंधानुकरण करना शुरू किया है, जबकि पाश्चात्य शैली भारतीय जीवन-पद्धति के लिए बिलकुल प्रतिकृल है। भारतीय पूर्णखूपेण वैदिक संस्कृति और परंपराओं के पक्षधर रहे हैं। भौतिकतावादी चिंतन और अनुकरण हमें मानसिक अशांति, हिंसा, उन्माद और शारीरिक असंतोष की ओर ले जा रहे हैं। इन सभी दुष्परिणामों का मुख्य
कारण है हमारे दोषपूर्ण आवास, व्यावसायिक संस्थान और विश्वविद्यालय आदि। पिछले तीन-चार दशकों में भारत ने भौतिक जगत् में तो आशातीत उन्नति की है, पर दूसरी ओर सांस्कृतिक- आध्यात्मिक मूल्यों का जितना नाश हुआ है, उसकी तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। प्राचीन काल में भारत विश्व में अध्यात्म में कई क्षेत्रों में अग्रणी रहा, क्योंकि हमारे प्राचीन विश्वविद्यालयों की नींव वैदिक वास्तु के आधार पर रखी गई थी। हमारे देवाालय, उपवन और आश्रम निश्चय ही आध्यात्मिक शांति और शक्ति का संचार करते थे। यद्यपि आज प्राचीन महल, मंदिर और उपवनों के केवल अवशेष रह गए हैं, फिर भी वे हमें अपनी ओर आक्षित करते हैं । इसके विपरीत, आधुनिक वास्तुशिल्प में बाह्याकर्षण तो है, परंतु आंतरिक सुख और शांति का पूर्णत: अभाव होता है। आचार्य वराहमिहिर और ऋषि वसिष्ठ जैसे विद्वानों ने बहत पहले ही सिद्ध कर दिया था कि किसी भी भूखंड या भवन का आकार-प्रकार का अभाव उसमें निवास करनेवाले परिवारों पर विशेष रूप से पड़ता है। इसी सत्य पर ही वास्तुशास्त्र की नींव आधारित है। वास्तुशास्त्र के पीछे विज्ञान यह है कि प्रकृति के पाँचों तत्तव-जल, वायु, अगनि, आकाश व पृथ्वी नवग्रहों के साथ मिलकर जब एक अनुकूल दबाव या प्रभाव किसी स्थान पर बनाते हैं तो उस स्थान के चारों ओर सुख-शांति का एक वर्तुल बन जाता है और वहाँ सुख के साथ वैभव आता है। इसके विपरीत, जब प्रकृति के इन तत्त्वों में सामंजस्य नहीं होता तो वहाँ सबकुछ विपरीत होता है। हमारे ऋषि- मुनियों ने इस विज्ञान का गहन अध्ययन किया और कई सुत्र बनाए, जिनके अनुसार यह निश्चित किया कि किसी भी मकान को बनाते समय उसका कौन सा भाग किस दिशा में हो, घर के किस भाग में घर के किस व्यक्ति को रहना चाहिए, ताकि प्रकृति के तत्त्वों से हमें अधिक-से-अधिक लाभ मिले और सुख- शांति प्राप्त हो। जब हम मकान या दुकान बनाते समय इन सूत्रों या नियमों का पालन नहीं करते तब हमारे जीवन में गड़बड़ शुरू हो जाती है।
आज के इस युग में वास्तुशास्त्र के सारे सूत्र या नियम हम पूर्णरूप से पालन नहीं कर सकते, परंतु जो कुछ भी जितना भी पालन कर सकते हैं , उनका पालन अवश्य करें। हर व्यक्ति यही चाहता है कि उसके पास खुब धन-दौलत और घर में सुख-शांति हो। उसका व्यवसाय, दुकान, फैक्टरी या फिर कार्यालय ऐसा हो जहाँ वह दिन दुगुनी व रात चौगुनी प्रगाति करे। ऐसा तभी हो सकता है जब उसके भाग्य में ऐसा लिखा हो। भाग्य केवल ग्रहों से या आदमी की अपनी मेहनत से ही नहीं बनता। वह स्थान, जहाँ वह रहता है या काम करता है, की आंतरिक शक्तियाँ भी भाग्य में योग देती हैं। यदि वह स्थान, जहाँ वह व्यक्ति रहता है, वास्तुशास्त्र के अनुसार निर्मित नहीं है तो उस व्यक्ति के अच्छे भाग्य के होते हुए भी उसकी उतनी उन्नति नहीं होगी जितनी कि हो सकती या फिर पैसा तो उसके पास बहत होगा, पर खर्चे इतने होंगे कि बचत शून्य होगी या फिर घर में शांति नहीं होगी और बीमारियाँ घेर लेंगी। हो सकता है- मकान में आग लग जाए, चोरी हो जाए, या फिर बिजली के उपकरणों में अकसर खराबी आती रहे। ऐसे कई कष्ट हो सकते हैं, जिनका संबंध व्यक्ति के भाग्य से अधिक उस स्थान की वास्तु से होता है, जहाँ वह रहता है अथवा कार्य करता है।

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