प्रकृति अर्थात् वनस्पति का हमारे धर्म में प्राचीन काल से अटुट संबंध रहा है। सच तो यह है कि सनातन धर्म की जड़े प्रकृति से ही जुड़ी हैं। वैदिक श्लोकों व मंत्रों में प्रकृति को माँ माना गया है। ऋषि -मुनियों ने सदा से ही प्रकृति से गहरा संबंध रखा है। इसीलिए हमारे रीति-रिवाजों में इसके प्रति लगाव छलकता है। मंत्रों में वनस्पति-पूजन भी शामिल था। देवताओं की श्रेणी में वनदेवता भी थे। 'यक्ष' वनों की रक्षा करते हैं, ऐसा विश्वास है। ऋषि-आश्रम घने जंगलों के बीच सुंदर उपवन जैसे होते थे, जहाँ जीवनदायिनी जड़ी-बूटियाँ उगाई जाती थीं और पशु-पक्षियों को संरक्षण मिलता था जो आज के सुरक्षित वनों जैसे थे। ये आश्रम उस समय के अनुसंधान केंद्र व शिक्षा संस्थान भी थे। आश्रमवासियों की दिनचर्या प्रकृति के अनुकूल होती थी। वहाँ किए जानेवाले नित्य यज्ञ वातावरण व वायुमंडल दोनों को शुद्ध करने व रखने के लिए होते थे। इन नित्य यज्ञों में गाय के घी की आहृति देने से परमाणु रेडिएशन से वातावरण की रक्षा भी होती थी। आश्रमों की भाँति देश का ग्रामीण जीवन प्रकृति के अनुरूप व अनुकूल ही होता था। रहने के लिए मिट्टी व घास के बने घर थे, जो सर्दियों में गरम व ग्रीष्म काल में ठंडे रहते थे। गाँव के बीच पीपल, नीम व जामुन के वृक्ष लगे होते थे और घर-घर में तुलसी के पौंधे थे। उत्सव व पर्व सब मिलकर मनाते थेकिसी प्रकार का जाति भेदभाव नहीं था। पर कालांतर में समाज में बुराइयाँ आ गई और भेदभाव दिखने लगा। परंतु सनातन धर्म अपने विशुद्ध रूप में निष्कलंक था। घर-ऑँगन साफ-सुथरा व गोबर-मिट्टी से लिपा हुआ रहता था। रूस के एक अनुसंधान के अनुसार गाय के गोबर से लिपा हुआ घर कीटाणु-रहित होता है। कुएँ का और बहती नदी का पानी स्वास्थ्यवर्धक होता था। खेती में प्राकृतिक खाद पड़ती थी। इसीलिए जो भी उपजता था, वह आजकल के पदार्थों की भाँति हानिकारक नहीं था । फल पेड़ों पर ही पकाए जाते थे, आजकल की तरह कृत्रिम रूप से उन्हें नहीं पकाया जाता था। जब कोई व्यक्ति पेड़ काटता था तो पहले उससे क्षमा- याचना करता था, फिर उस पेड़ के दँठ (शेष भाग) पर घी लगाता था और बाद में दस पौधे लगाता था कुछ वृक्षों को जैसे पीपल और वट वृक्ष आदि को तो काटना वर्जित था। वृक्षों की पूजा होती थी। आज जो हम 'वातावरण बचाओ' अभियान की बात करते हैं, वह हमारे अपने मूल सनातन नियमों के उल्लंघन के ही कारण है। संक्षेप में यदि कहा जाए तो यही है कि सुखी जीवन के लिए जीवन का प्रकृति के साथ निकटता एवं संतुलन बनाए रखना जरूरी है। प्रकृति को यदि हम माँ मानेंगे तो वह हमें बच्चों की तरह संरक्षण देगी और यदि हम उसे दासी मानकर वश में करेंगे तो परिणाम विनाशक ही होंगे। बाढ़ आएगी, सुनामी आएगी और सुखा पड़ेगा आदि बहुत से ऐसे संकट जिनकी हम कल्पना भी नही कर सकते
आपको ये जानकारी केसी लगी हमे अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे और आप अगर हमें कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है तो आप हमसे सोशल मीडिया के माध्यम से बात कर सकते