सनातन-ध्वजा केसरिया क्यों


हमने भारत के तिरंगे को मान्य कर उसे भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकारा तो इसमें हमने सर्वप्रथम केसरिया रंग को डाला। इस रंग को इतनी महत्ता देने का कारण था कि यह रंग भारत की मूल संस्कृति से जुड़ा है और इसके पीछे एक गहरा 'दर्शन' है। केसरिया रंग दो प्राथमिक रंगों लाल व पीला का मिश्रण है। पुरातन मान्यताओं के अनुसार लाल रंग माँ दुर्गा,
गणेश और हनुमान से जुड़ा है। यह रंग शक्ति का द्योतक है। यह रंग कर्मठता को इंगित करता है। यह रंग पौरुष को दरशाता है। यह रंग हमें कर्मशील होने को कहता है। दूसरी ओर पीला रंग विष्णु और बृहस्पति दोनों का परिचायक है। विष्णु को सदा से शांत रहनेवाले, पर हर समस्या का समाधान निकालनेवाले विवेकशील देव के रूप में माना गया है। बृहस्पति को तो ज्ञान-स्वरूप ही कहते हैं। वे बुद्धिमत्ता के सागर हैं। इस प्रकार केसरिया रंग जो लाल और पीले रंगं का मिश्रण है, जहाँ हमें सक्रिय, कर्मठ और पौरुष होने की
पुरणा देता है, वहीं यह भी संदेश देता है कि हम सक्रिय रहते हुए विवेक से भी काम लें। ऐसा कर्म जो बुद्धि और विवेक के साथ न किया गया हो, कल्याणकारी नहीं हो सकता। इसीलिए इन दोनों रंगों की युक्तिवाला केसरिया रंग महत्तवपूर्ण है। यही इसका 'दर्शन' है। हमारे ऋषि-मुनि भगवा इसी कारण पहनते थे, ताकि उन्हें दोनों रंगं की तरंगें प्राप्त होती रहें। वे हमरे प्राचीन समाज के सक्रिय अंग थे, केवल उपदेशक नहीं। जो लोग यह समझते हैं कि साधू-संत समाज के निष्क्रिय अंग हैं, तो वे इनके योगदान को नहीं पहचानते। सनातन ऋषि-मुनियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। वैसे आजकल के साधु-संत अधिकतर पुरातन कसौटी पर खरे नहीं उतरते।ना ही कभी खरे उतर सकते है  

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