क्यों बजाए जाते है मंदिरों में शंख व घंट नही बजाए तो क्या ?


यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि ध्वनि विस्तार में सूर्य की किरणें बाधक होती हैं। इसी कारण रेडियो प्रसारण दिन की अपेक्षा रात को अधिक स्पष्ट होता है। प्राय: सायंकाल व सूर्य किरणें जब निस्तेज होती हैं तब शंख फूँकने व घंटा-घड़ियाल बजाने का विधान है। एक बार शंख फूँकने पर जहाँ तक उसकी ध्वनि जाती है, वहाँ तक बीमारियाँ के कीटाणु, जो वातावरण में विद्यमान होते हैं, निष्क्रिय हो जाते हैं । इसी प्रकार की ध्वनि के प्रभाव से वे कीटाणु या तो नष्ट हो जाते हैं या फिर निष्रिय। जाने-माने वैज्ञानिक श्री जगदीशचंद्र बसु ने इस सत्य को यंत्रों द्वारा प्रमाणित किया था। नियमित शंख व घड़ियाल की ध्वनि वायुमंडल को विशुद्ध बनाने व पर्यावरण को संतृलित करने में अत्यंत सहायक होती है। इस वैज्ञानिक सत्य की खोज हजारों वर्ष पूर्व हमारे ऋषि-मुनियों ने की थी। शंख और घंटे-घड़ियाल की ध्वनि से स्थूल पदार्थों में से भी उनकी नकारात्मकता (Negatvity) नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि मंदिरों की दीवाें भी शांति प्रदान करती हैं । इसके अतिरिक्त, मूकता और हकलापन दूर करने के लिए शंख ध्वनि श्रवण करना एक महौषधि है।
निरंतर शंख फूँकनेवाले व्यक्ति को श्वास की बीमारी, दमा एवं
फेफड़ों का रोग नहीं होता, क्योंकि शंख फूँकने से फेफड्रों से शरीर की सारी दुषित वायु बाहर निकल जाती है और
साथ ही उनकी वायु-धारण क्षमता भी बढ़ुती है। आपने देखा होगा कि प्रायः मंदिरों आदि में आरती के पश्चात् शंख में जल भरकर उपस्थित जनों पर उसे छिड़का जाता है। इसी प्रकार शंख के जल से देवालय में रखी समस्त पूजा सामग्री का प्रक्षालन करते हैं। ऐसा करने से वे सब वस्तुएँ सुवासित एवं रोगाणु-रहित होकर शुद्ध हो जाती हैं। शंख में जल रखने से उस जल में रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता आ जाती है, क्योंकि शंख में गंधक, फास्फोरस और कैल्सियम की मात्रा होती है। इस कारण शंख में रखा जलविसंक्रामक(Disinfecl) हो जाता है। या फिर ऐसा भी कह सकते है कि सनेटाएज बन जाता है जो की आम लोगो को तब तक महंगा लगता था जब तक कोरोनारूपी प्रलय धरतीपर अवतरित नही हुआ

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