नमस्कार दोस्तों में आपका स्वागत करता हु अपने ब्लॉग में तो आज हम बात करने वाले है गंगा नदी के बारे जो जिसे गंगामय्या भी संबोधित किया जाता है और किया भी जाना चाहिए क्योंकि गंगामय्या के स्नान में ही इंसान के पापो का निवारण हो जाता है और तो ओर आप इस नदी के वैज्ञानिक गुण जानकर भी हैरान हो जाएंगे
भगीरथ ने ब्रम्हा व शिव की उपासना कर गंगा को पृथ्वी पर अपने पूर्वजों के कल्याणार्थ उतारा था-ऐसा पुराणों में लिखा है। गंगा में स्नान करने से मनुष्य के पाप कट जाते हैं, ऐसा हिंदुओं का विश्वास है। गंगा में अस्थियाँ बहाने से वे शीघ्र जलतत्त्व में मिल जाती हैं, यह सत्य सर्वविदित है। यही नहीं, गंगाजल महीनों बोतल में बंद रखने पर भी दृषित नहीं होता, यह तथ्य अब तो वैज्ञानिक भी स्वीकारते हैं। भारतवर्ष में अनेक नदियाँ हैं, जैसे- यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, सिंधु, ब्रह्मपत्र आदि। सभी नदियों के अपने-अपने उदुगम स्थल हैं और बहने का अपना-अपना मार्ग, जिसे उन्होंने अपने आप अपने प्रवाह के साथ बनाया है। वेद-पुराण पढ़ने के बाद हमें ऐसा कोई प्रसंग नहीं मिलता, जिसमें यह वर्णन हो कि गंगा के अलावा किसी और नदी का उद्गम व मार्ग किसी व्यक्ति ने खोजा और बनाया हो। ऐसा केवल गंगा के साथ ही हुआ है।
इस दृष्टि से गंगा 'नदी' नहीं है, क्योंकि एक प्राकृतिक नदी वह होती है जो स्वयं बहे। संस्कृत में 'नद' का अर्थ है बहना। नदी शब्द भी नद से ही बना है। पर गंगा स्वयं नहीं बही, यह बहाई गई है। इसे भरगीरथ ने खोजा और फिर उसका मार्ग निश्चित किया। ऐसा संसार की किसी और नदी के साथ नहीं हुआ। परंतु गंगा की पवित्रता को देखते हुए ऐसा लगता है कि गंगा एक ऐसी विशिष्ट जलराशि है जो नदी ही नहीं, उससे भी उच्च श्रेणी की प्राकृतिक जल-संपदा है, जिसे भगीरथ ने किसी विशेष प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए खोजा होगा। कथा में आता है कि कफिल मुनि ने भरगीरथ के दादा राजा सगर को कहा था कि उनके साठ हजार पुत्रों का कल्याण तभी होगा जब उनकी अस्थियाँ पवित्र जल से बहाकर समद्र में प्रवाहित की जाएँ। राजा सगर और फिर उनके पुत्र राजा दलीप दोनों का सारा जीवन उस पवित्र जलराशि को खोजने में बीत गया, पर वे इस जलराशि को ढँढ़ नहीं पाए। भगीरथ ने अपने पिता व दादा की खोज को आगे बढ़ाया। यदि प्रश्न केवल किसी भी जलराशि से पूर्वजों की अस्थियों को समुद्र में प्रवाहित करना होता तो फिर भगीरथ को बंगदेश से गंगोत्तरी तक जाने की
आवश्यकता नहीं होती। वह मार्ग में कहीं से भी, किसी पर्वत श्रृंखला से किसी भी नदी को लाकर अपने पूर्वजों का तर्पण कर देते । परंतु कपिल मुनि के शाप से मुक्ति पाने के लिए भगीरथ को तो किसी विशिष्ट पवित्र जलराशि की खोज थी, जो पापनाशिनी हो। अत: ऐसी पवित्र जलराशि की खोज करते-करते भगीरथ गंगोत्तरी पहँचे, क्योंकि मार्ग में उन्हें उनके मतलब की जलराशि कहीं नहीं मिली। इसका अर्थ यह हुआ कि गंगोत्तरी एक विशेष भौगोलिक महत्ता का स्थल है, जहाँ दैविक शक्ति प्रकृति के साथ उसे विशिष्ट बनाती हैं। यहाँ मन में एक प्रश्न यह उठता है कि गंगोत्तरी में ऐसा क्या दैविक है, जो कहीं और नहीं है? भगीरथ जब गंगोत्तरी क्षेत्र में पहँचे तो उन्होंने देखा कि वहाँ चौबीस वर्ग मील के क्षेत्र में ३०० फीट ऊँचा एक हिमखंड है, जो सदियों से अचल खड़ा है। पुराणों में इसे ही गंगा को शिव की जटाओं में बंद कहा गया है। इस हिमखंड पर सत बृहस्पति ग्रह की तरंगें गिरती रहती हैं, जो गंगोत्तरी की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण है। बृहस्पति ग्रह की ये तरंगें यहाँ इस हिमखंड को पवित्र करती हैं और दैविक बनाती हैं, जिस कारण यह एक पवित्र खंड बन गया है। पुराणों में इसी बात को गंगा के स्वर्ग से अवतरित होना बताया गया है, क्योंकि बृहस्पति की दैविक तरंगें ऊपर (स्वर्ग) से ही तो आती हैं। बृहस्पति ग्रह से आनेवाली तरंगें विश्व में अन्यत्र किसी अन्य स्थल पर इस प्रकार नहीं गिरतीं। भगीरथ को ऐसे ही स्थल की खोज थी, जो गंगोत्तरी पर पूरी हुई। भगीरथ ने उस हिमखंड के मूल से जल निकलने का मार्ग बनाया, जिसे गोमुख की संज्ञा दी गई। प्राणों में इसे ही शिव आराधना करके गंगा को शिव की जटाओं से धीरे-धीरे छोड़ना कहा गया है। भगीरथ ने फिर उस जलधारा का मार्ग बनाया। मार्ग के सारे अवरोधों को हटाकर गंगा को देवप्रयाग नामक स्थल पर अलकनंदा नदी से मिला दिया और आगे का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार गंगा का अवतरण हुआ। गंगा की पवित्रता व इसके जल में पापनाशिनी त्त्व बृहस्पति ग्रह की कॉस्मिक रेज (तरंगों) व मार्ग की हिमालय पर पाई जानेवाली खास जड़ी-बूटियों के कारण है, जो गंगाजल को वर्षों तक दूषित होने नहीं देतीं। गंगा इस प्रकार आस्था के साथ-साथ अपनी वैज्ञानिक स्थिति के कारण पवित्र व पापनाशिनी है। गंगा की पवित्रता और विशिष्टता अब तो वैज्ञानिक भी स्वीकारते हैं।
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